कहानी आज-कल की

29 अगस्त 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (289 बार पढ़ा जा चुका है)

कहानी आज-कल की

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🖤🖤 कहानी आज-कल की 🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤


कहानी नानी-दादी की

सुनने का वख़्त कहाँ?

स्कुल- कॉलेज- औफिस बंद, ऑनलाइन सहारा है

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

चाँद-सितारों-गुड़िया की

बातें रह गई कहाँ?

घर में दुबके छ मास-

निकला बेहिसाब दिवाला है

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

कहानी है एक लगभग

सारे जमाने की,

घर में रहना सुरक्षित,

बाहर तो धधकती ज्वाला है

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

घर-परिवार बिखरे-

अनैतिक मस्ती में झूम रहा है

मानो घर बना होटल था-

बाजू से चुप बेटा निकलता है

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

स्वार्थपरता व्याप्त-

असहाय वृद्ध अवहेलित था

छल-प्रपंच का हर ओर लगा

छिट - पुट मेला था

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

"साम्यवादी" मानव का पशुवत्

दूहन- प्रतारण करता था

पुंजिपति शोषण कर हर साल नया

मॉल खड़ा करता था

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

आँसुओं की परवाह किसे,

नेता झूठा आस्वासन देता था

प्यार- मोहब्बत लुप्त, आतंक-

हिंसा का डंका बजता था

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

ताण्डव तमसा चहुँदिसी बाजार में

'जहर' भी बिकता था

हटात् प्रकृति ने 'दण्ड' चलाया,

हरओर सन्नाटा छाया था

🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

कुछ चेत कर बने सात्विक,

बाकि ने मातम का खेला झेला था

खत्म करो यह कहानी कोभिड की-

पाँचजन्य में साधु बोला था

,🖤🖤🖤🖤🖤🖤🖤

डाॅ. कवि कुमार निर्मल

बेतिया (बिहार)

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