मुक्तक

30 अगस्त 2020   |  महातम मिश्रा   (274 बार पढ़ा जा चुका है)

"मुक्तक"


चलो अब जा मिलें उनसे जो यादों में विचरते हैं।
कभी अपने रहें होंगे तभी दर पर भटकते हैं।
सुना है वक्त अपने आप भर देता है जख्मों को-
मगर निशान हैं अपने जो उड़ उड़ कर दहकते हैं।।


गर्वित है यह दिन सखे, गर्वित है यह रात।
इसी निशा के गर्भ में, थी स्वतंत्र सौगात।
पंद्रह को लाली खिली, माह अगस्त विराट-
नमन सपूतों को करूँ, और न कोई बात।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: दोहा



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
दो
30 अगस्त 2020
मु
30 अगस्त 2020
गी
22 अगस्त 2020
मु
30 अगस्त 2020
मु
30 अगस्त 2020
मु
30 अगस्त 2020
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x