गाँव की मिट्टी

30 अगस्त 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (305 बार पढ़ा जा चुका है)

गाँव की मिट्टी

गाँव की मिट्टी से भगवान तक
★☆★☆★☆★★☆★☆★☆★
🏠🏠🏠गाँव की मिट्टी🏠🏠🏠
गाँव गया नानी के, गर्मी की छुट्टी-
मुझको कुछ काम न था
कभी गगन को तकता तो-
कभी अपने कोले में जाता था
पहली बौछार पड़ी मिट्टी पर-
सौंधी गंध- मजा आता था
मिट्टी लेप चौका में नानी
लकड़ी के चुल्हा पर भात पकाती
छौंक दाल को आलू का
भुजिया तल कर भर-पेट खिलाती
ज्ञान टपका पाठशाला का मन में-
विचित्र ख्याल आता था
प्रकृति का खेला देख कर
मन मेरा आह्लादित हो जाता था
बीज गगन से एक अचानक

आ जब था टपका
नम मिट्टी पा कर--

ध्रुतगति से वह था चमका
प्रकाश की उष्णता,
सुक्ष्म उर्जा एवम् मिट्टी का

पोषक तत्व वो पाया
अंकुरित हो, जब पहली
'कोपल' थी फूटी-

आह्लाद से मन भर आया
लगा खोजने उस जादुगर को,
पर नहीं कहीं उसे देख नहीं मैं पाया
हर पल अनुभव किया सामिप्य,
भगवान् कह परम अराध्य बनाया
मानव ने उसे हीं शायद प्रसाद चड़ा-
"अमृत" समझ कर हीं खाया
पर उसी अराध्य को

पत्थर में बैठा कर--
जीवंत कर ऊँचा बैठाया
जल-वस्त्र-आरती-नैवेद्य,
नियमित पुजन-

धंटी बजा उसे रिझाया
गाँव की मिट्टी भूला,
अंत काल में प्रभू का नाम

मन में नहीं आया


डॉ. कवि कुमार निर्मल
भु. पु. वरीय चिकित्सा प्रभारी
एम. बी. बी. एस. (1978/फैमिली फीजिशियन)
पश्चिम बंगाल, बिहार सरकार (स्वास्थ्य विभाग)
बेतिया (पश्चिम चंपारण) बेतिया
7209833141 / 9708055684
k.k.nirmal2009@gmail.com

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