समय की बहती धारा

05 सितम्बर 2020   |  Ashvini Kumar Mishra   (424 बार पढ़ा जा चुका है)

समय की बहती धारा में कही थम सा गया हूँ मैं

अनजानी सी राहों में

बेचैन ख़यालों में, रुक सा गया हूँ मैं

बहती नदी में कही अटक सा गया हूँ

चलते चलते जो रुक गया हूँ मैं

ऐसा लगता है थक गया हूँ मैं

कभी सोचता हूँ,

यहाँ से निकला तो कहा जाऊंगा

शायद डरता हूँ रास्तो के जोखिमों से

जो लहरों संग निकला तो पटका जाऊंगा

फिर मन मेरा ये कहता है

चल मन कोशिश करके देखते है

कभी धूप तो कभी छाँव होगी

चल बह निकल समय की नदी के साथ

कही तो पहुँच जायेगा

हो सकता है

चल कर भी मंजिल ना मिल पायें

पर चला ही नही तो

तो अफ़सोस रह जाएगा

के चल देता तो जहान नाप लेता

चल मन अपनी थकान,

बेचैन ख़यालों,

को पीछे छोड़ आगे बढ़ते है......


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