स्त्री अभिलाषा

06 सितम्बर 2020   |  अभिनव मिश्रा"अदम्य"   (439 बार पढ़ा जा चुका है)

स्त्री अभिलाषा

स्त्री अभिलाषा


चाह नहीं मैं क्रूर व्यक्ति,

अनपढ़ संग थोपी जाऊं ।

चाह नहीं पौधे की तरह,

जब चाहे जहां रोपी जाऊं ।।


चाह नहीं शादी की है,

जो दहेज प्रथा में मर जाऊं ।

चाह नहीं अपने अधिकारों,

से वंचित रह जाऊं ।।

हम अवला को कुछ और नहीं,

इज्जत व सम्मान मिले ।

वंचित ना हो अधिकारों से,

घर वर सरल समाज मिले ।।


तुम भूल गए लक्ष्मी दुर्गा को,

क्या इनके बलिदान रहे ।

बंद करो यह नारी शोषण,

क्यों कोख में बेटी मार रहे ।।


अभिनव मिश्रा

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