टपकी बुँद पसिने की

12 सितम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (421 बार पढ़ा जा चुका है)

टपकी बुँद पसिने की

टपकी बुँद पसीने की


माथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैं

टपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैं

तपिश है उमस भरी- ठंढ़ी छाँव ढ़ूंढ़ वे रहीं हैं

अपनी हीं तश्वीरों को देख मदहोश हो रही है

माथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैं

टपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैं


डॉ. कवि कुमार निर्मल

DrKavi Kumar Nirmal

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