जिंदगी धूल हो गई

18 सितम्बर 2020   |  नीतू टिटाण   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

छोटे तो सब अच्छा था बड़े होकर जैसे भूल हो गई

पहले खेलते थे मिट्टी से जनाब लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई


कोई डांट देता था तो झट से रो जाया करते थे फिर पापा मम्मी के सहला देने से तो आराम से सो जाया करते थे

अब कोई डांट दे तो रोते नहीं अब आराम से सोते नहीं

दोस्तों अब तो ऑफिस और घर के पीछे जिंदगी मानो शूल हो गई


पहले खेलते थे मिट्टी से लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई


बचपन के खेल बहुत भाते थे हमें लेते नहीं थे रिश्तेदार पैसे दे जाते थे हमें

अब खेल की कीमत कम पैसों की ज्यादा हो गई

पहले मान लिया करते थे सब की सलाह पर अब वह सलाह भी फिजूल हो गई

पहले खेलते थे मिट्टी से लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई


मर्जी चल जाती थी बचपन में बड़ी हमारी

मम्मी पापा को लगी रहती थी हर वक्त फिक्र हमारी

अब वही मां बाप क्यों लाचार हो गए

फिक्र और बचपन छोड़ो अब तो जिंदगी पैसा कमाने में पूरी तरह मशगूल हो गई

पहले खेलते थे मिट्टी से जनाब लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई


पहले हर खिलौना हमें अपना सा लगता था

कोई मांग ना ले यह प्यारी दुनिया हमसे ऐसा खतरा सा लगता था

अब हम खिलौना बन गए वक्त चाबी चला रहा

अब तो लगता है मौत की तारीख ऊपर वाले से कबूल हो गई

पहले खेलते थे मिट्टी से जनाब लेकिन अब तो जिंदगी ही धूल हो गई

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आलोक सिन्हा
23 सितम्बर 2020

बहुत अच्छी रचना है |

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