जीवन

21 सितम्बर 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (317 बार पढ़ा जा चुका है)

जीवन

अभी दो तीन पूर्व हमारी एक मित्र के देवर जी का स्वर्गवास हो गया... असमय... शायद कोरोना के कारण... सोचने को विवश हो गए कि एक महामारी ने सभी को हरा दिया... ऐसे में जीवन को क्या समझें...? हम सभी जानते हैं जीवन मरणशील है... जो जन्मा है... एक न एक दिन उसे जाना ही होगा... इसीलिए जीवन सत्य भी है और असत्य भी... भाव भी है और अभाव भी... कुछ इसी तरह के उलझे सुलझे विचारों से युक्त है हमारी आज की रचना... जीवन भाव भी अभाव भी... कात्यायनी...

जीवन अभाव भी भाव भी

जीवन का नहीं होता अवसान कभी

न ही होता है इसका अन्त कभी / अभाव कभी…

क्योंकि अभाव है दूसरा नाम भाव का

असम्भव है भाव के बिना अभाव भी…

क्योंकि अन्त है दूसरा नाम आरम्भ का

असम्भव है आरम्भ के बिना अन्त भी…

अभाव है यदि, तो भाव तो विद्यमान स्वयं ही है

अन्त है यदि, तो आरम्भ तो विद्यमान स्वयं ही है

इसीलिए न तो है जीवन का अवसान या समापन

न ही है इसका अन्त या अभाव…

जीवन नहीं है असत्य भी

क्योंकि होता यदि असत्य / तो कैसे दीख पड़ती सत्ता इसकी…

हाँ, अन्तराल होता है अवश्य / कुछ समय का / किसी चलचित्र की भाँति

ताकि नवीन रूप में जीवन पुनः भर सके उछाह की कुलाँचें…

हो जाता है तिरोहित भी कभी / छिप जाता है आँचल में प्रेमिका के अपनी…

प्रेमिका – नाम है जिसका मृत्यु

आती है जो इठलाती बलखाती / दिखाती नित नवीन भाव भंगिमाएँ

आकर्षित करती / लुभाती / अपने प्रेमी को

ढाँप लेती है नेहपगे आँचल में अपने…

थक जाता है जीवन जब, वहन करते हुए भार अपने उत्तरदायित्वों का

थक जाता है जीवन जब / दौड़ते भागते गिरते पड़ते

अनवरत – निरन्तर – प्रतिपल – प्रतिक्षण

सो जाता है तब सर रखकर गोद में प्यारी सखी की

कुछ पलों के लिए / पुनः जागने हेतु…

तब कोई स्नेहशील आत्मा पुनः करती है रोपित स्नेह का एक बीज

सींचा जाता है जिसे स्नेह के अमृत जल से…

और तब, विश्राम के बाद कुछ पलों के / होता है पुनर्जागरण जीवन का

फूटती हैं नवीन कोंपलें और होती है वृद्धि…

तब बन जाता है पुनः एक छायादार वृक्ष

मिलता है विश्राम जिसकी छाया में अनेकों सम्वेदनाओं को / भावनाओं को

इच्छाओं को / आकाँक्षाओं को / लोभ को / मोह को

जहाँ विश्राम पाते हैं क्रोध और घृणा / प्रेम और विश्वास

स्वप्न रूपी खगचर झूलते हैं टहनियों पर जिसकी

भरती है जिसमें गति – लय और ऊर्जा / प्रेमपगी मलय पवन की सुगन्ध से…

हो जाता है नवजीवन उत्साह उमंग तथा नवयौवन से परिपूर्ण

चहचहाने लगता है फिर एक बार मस्ती में भर

श्रम और कष्टों के झाड़ों के मध्य एक बार फिर

लहलहाने लगती है सुख की पीली सरसों…

जिसे देख गूँजती है कोयल की मधुर रागिनी

जो बताती है – जीवन है एक ऐसा स्वप्न – जो बन जाता है सत्य भी

जो बताती है – जीवन है एक ऐसा अभाव – जो बन जाता है भाव भी

यही तो है जीवन का सत्य... चिरन्तन... शाश्वत...

https://youtu.be/DjbogdGhzXg

अगला लेख: कवयित्री संगोष्ठी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
11 सितम्बर 2020
कैसे वक़्त ने पलटा खायालोगो की नज़र में कल तक जो डॉक्टर भगवान थाआज वो डाकु हो गयाहर नुक्कड़ हर चौराहे पर चर्चा आम हैंडॉक्टर नही शैतान हैंलोगो की लाज हया शर्म सब मर गईकैसे वक़्त ने पलटा खायाजब खुद बीमार ना हुए तब तकडॉक्टर का महत्व ना समझ आयानुक्कड़ छुटा चौराहा छुटाछुटी फोकट की बात अस्पताल में डॉक्टर ही दि
11 सितम्बर 2020
21 सितम्बर 2020
अभी दो तीन पूर्व हमारी एक मित्र के देवर जी का स्वर्गवास हो गया... असमय...शायद कोरोना के कारण... सोचने को विवश हो गए कि एक महामारी ने सभी को हरा दिया...ऐसे में जीवन को क्या समझें...? हम सभी जानते हैं जीवन मरणशील है... जो जन्माहै... एक न एक दिन उसे जाना ही होगा... इसीलिए जीवन सत्य भी है और असत्य भी...
21 सितम्बर 2020
15 सितम्बर 2020
संस्कृत साहित्य में हिमालय- भारतीयसंस्कृति का प्रतीककुछदिवस पूर्व “हिमालय - अदम्य साधना की सिद्धि का प्रतीक” शीर्षक से एक लेख सुधीजनोंके समक्ष प्रस्तुत किया था | आप सभी से प्राप्त प्रोत्साहन के कारण आज उसी लेख कोकुछ विस्तार देने का प्रयास रहे हैं जिसका भाव यही है कि ह
15 सितम्बर 2020
24 सितम्बर 2020
गीता औरदेहान्तरप्राप्तिश्राद्ध पक्ष में श्रद्धा के प्रतीक श्राद्ध पर्व काआयोजन प्रायः हर हिन्दू परिवार में होता है | पितृविसर्जनीअमावस्या के साथ इसका समापन होता है और तभी से माँ दुर्गा की उपासना के साथ त्यौहारोंकी श्रृंखला आरम्भ हो जाती है – नवरात्र पर्व, विजयादशमी,शरद पूर्णिमा आदि करते करते माँ लक्
24 सितम्बर 2020
27 सितम्बर 2020
शुक्र का सिंह में गोचर कोरोना महामारी का प्रकोप अभी भी थमानहीं है, किन्तु जन जीवन धीरे धीरे पटरी पर लौटने का प्रयास आरम्भकर रहा है – कुछ निश्चित और विशेष सावधानियों के साथ | इसी स्थिति में कल सोमवार, अधिक आश्विन शुक्ल द्वादशी को अर्द्धरात्र्योत्तर एक बजकर तीन मिनट केलगभग बव करण और धृति योग में समस्त
27 सितम्बर 2020
27 सितम्बर 2020
आज Daughter’s day है, यानी बिटिया दिवस... सर्वप्रथम सभी को Daughter’s day की बधाई... आज एक बार अपनी उलझी सुलझी सी बातों के साथ आपके सामने हैं...हमारी आज की रचना का शीर्षक है तू कभी न दुर्बल हो सकती... अपनी आज की रचनाप्रस्तुत करें उससे पहले दो बातें... हमारी प्रकृति वास्तव में नारी रूपा है...जाने कित
27 सितम्बर 2020
12 सितम्बर 2020
टपकी बुँद पसीने कीमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंतपिश है उमस भरी- ठंढ़ी छाँव ढ़ूंढ़ वे रहीं हैंअपनी हीं तश्वीरों को देख मदहोश हो रही हैमाथे पर आई पसिने की बुँदे कुछ कह रही हैंटपक - टपक पलकों को जब - तब छू रही हैंडॉ. कवि कुमार निर्मलDrKavi Kumar Nirmal
12 सितम्बर 2020
25 सितम्बर 2020
हम अक्सर दूसरों को उपदेश देते हैं कि हमें अपने अहंकार को नष्टकरना चाहिए, हमें अपने क्रोध पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए | सही बात है, ऐसा होना चाहिए यदि जीवन में सुख और शान्तिकी अभिलाषा है | लेकिन हम इन आदर्शों को स्वयं के जीवन मेंकितना उतार पाते हैं सोचने वाली बात यह है | देखा जाए तोकर्म
25 सितम्बर 2020
01 अक्तूबर 2020
नमस्कार... स्वागत है आज आप सबका WOW India के आओ कुछबात करें कार्यक्रम में... आज एक बार फिर से एक छोटी सी काव्य गोष्ठी... अभी तीनदिन पूर्व बिटिया दिवस था... हमारी कुछ सदस्यों ने बिटिया और नारी के विविध रूपोंपर कुछ रचनाएँ रचीं और उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग्स हमें भेजीं,जिन्हें हमने काव्य गोष्ठी के रूप में
01 अक्तूबर 2020
08 सितम्बर 2020
मैं शीश झुकाऊँ मानव कोइस जीवन को मैं केवल सपना क्यों समझूँ,हरभोर उषा की किरण जगाती है मुझको…हरशाम निशा की बाहों में मुस्काता हैचंदा, मस्ती छाती मुझको||रचना सुनने के लिए देखें वीडियो... कात्यायनी...https://youtu.be/txYk946TuoI
08 सितम्बर 2020
17 सितम्बर 2020
आज अमावस्या तिथि है...हम सभी ने अपने पितृगणों को विदा किया है पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ...अमावस्या का सारा कार्यक्रम पूर्ण करके कुछ पल विश्राम के लिए बैठे तो मन में कुछविचार घुमड़ने लगे... मन के भाव प्रस्तुत हैं इन पंक्तियों के साथ...भरी भीड़ में मन बेचाराखड़ा हुआ कुछ सहमा कुछसकुचाया साद्विविधाओं क
17 सितम्बर 2020
06 सितम्बर 2020
स्त्री अभिलाषा चाह नहीं मैं क्रूर व्यक्ति,अनपढ़ संग थोपी जाऊं । चाह नहीं पौधे की तरह, जब चाहे जहां रोपी जाऊं ।। चाह नहीं शादी की है, जो दहेज प्रथा में मर जाऊं । चाह नहीं अपने अधिकारों, से वंचित रह जाऊं ।। हम अवला को कुछ और नहीं,
06 सितम्बर 2020
07 सितम्बर 2020
तु
कल मिलने आइ वो,मेरा पसंदीदा पकवान लाई वो।हम दोनो बहुत सारी बातें किये,उसकी और मेरे नयन ने भी मुलाक़ातें किए।अचानक से पूछी मुझसे.ये बताओ, मुझमे और इश्क़ में क्या अंतर हैं?मैंने कहाँ, तुझमें और तेरे इश्क़ में अंतर है इतना,तु ख़्वाब है और वो है सपना।अब वो नाराज़ हो गईं,रोते-रोते मेरे हाई कँधो पर सो गईं
07 सितम्बर 2020
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x