हवा को चलने दो

25 सितम्बर 2020   |  सीताराम   (420 बार पढ़ा जा चुका है)

होने दो
हवा को चलने दो
बारिश को आने दो
शेर को खाने दो
जो हो रहा होने दो
बादल बनेंगे बिगड़ेंगे
तूफान आयेगा जाएगा
मुझे इससे क्या लेना
जो हो रहा होने दो
कोई भूख से रोता है
तो कोई अन्याय से
तो क्या ?
इनको रोने दो
जो हो रहा है होने दो
किसी को वोट की पड़ी है
तो किसी को देश भक्ति की
बाढ़ से किसी को क्या लेना
जो हो रहा है होने दो
रोज़ खाना खाना है
पढ़ लिख कर अपने परिवार
का गुजारा हो जाए इतना कमाना है
झूठ बोल कर वादे कर के
कुर्सी पर बैठ जाना है
अपने काम बनता भाड़ में जाए जनता
यह वाक्य मन में दोहराना है
देश का क्या देश तो
पहले भी चल रहा था
आगे भी चलेगा
जो हो रहा है होने दो
माना की ग़म बहुत है
यह भी तो सोचों
दूसरों से
कम बहुत है
हर बार मन से एक ग़म लिखता हूँ
मुस्कान की लहर हटा जाती है
माना की कभी कभी तूफान भी लाती है
लेकिन मुस्कान ही तो है
जो सब फिर शांत कर जाती है..


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