श्रिंगार से भक्ति तक

30 सितम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (457 बार पढ़ा जा चुका है)

श्रिंगार से भक्ति तक

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📿📿📿📿सोलह श्रिंगार📿📿📿
🌱🌲🌳🌴🌾🌿🌾🌴🌳🌲🌱
कोई है आगे, कोई चला पीछे
फिलहाल पौधों को हम सींचे
सोए खाट पर आँख को मीचे
काव्य चक्र को न कोई खींचे
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
दो दाना चने का खा,
करे वह संतोषि माँ व्रत।
सात समन्दर पार बसे,
लिख पाए ना ईक खत।।
🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇
दीये और बाती से अँधेरी रात जगमगाना।
प्रेम सुधा तेल सम- जी भर उढले जाना।।
🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃
कृतित्व रविसम सँवर मैं पाऊँ।
व्यक्तित्व देवसम निखार पाउँ।।
श्रिंगार सदन का स्वामि कहलाऊँ।
गंगा के तीर संग-संग

चल गंगासागर जाऊँ।।
🚣🚣🚣🚣🚣🚣🚣🚣🚣
दुश्मन अँधेरे के तुम हो,
उजाला कत्तई न हमको भाता है।
थक के चूर चूर तुम रहते हैं,
करवट बदल मीतवा सो जाता है।।
🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁
सावन-भादो हर साल

आ बहा ले जाएगा।
प्रेम का रंग होली में

चड़ जम रे! जाएगा।।
चराग़ जगमगाएँगे दिवाली में,
आज पुरजोर सिंधारा

मनाया जाएगा।।।
🌊🌊💐💐🌊🌊
सतायु भव-वरद हस्त
त्रिपुण्ड पर गुरु ने रख दिया।
"ब्रह्म तरैवेति ब्रह्मचर्य" कह
चुपचाप वो निकल गया।।
सोलह श्रिंगार किये नवेली को
साजन बन घर अपने लाया।।।


🌺🌹डॉ• कवि कुमार निर्मल🌹🌺
बेतिया (बिहार)
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