न्याय के लिए क्या मरना ज़रूरी है ....?

01 अक्तूबर 2020   |  परमजीत कौर   (432 बार पढ़ा जा चुका है)

यह कौन -सा विकास हो रहा है ...?

जहाँ ,गलत को सही ,

और ,सही को दबा देने का प्रयास हो रहा है !

वे कहते हैं ,साक्षरता बढ़ रही है ।

समाज की कुंठित सोच तो आज भी पनप रही है ।

औरत आज भी है ,मात्र हाड़ -माँस की कहानी ,

शरीर की भूख मिटा , जिसे रौंद कर मिटा देने में है आसानी!

हाँ ,यह लोकतंत्र है ...!

अंधा क़ानून सबूत माँगता है ।

अब ,कुछ दिन चर्चाओं में लाश को नोचेंगे गिद्ध ,

मुद्दा बना , आरोप -प्रत्यारोप भी होंगे ।

इसलिए ,आनन -फानन में नियम -कानून की धज्जियाँ उड़ा ,

संवेदनाओं की चिता जला दी गई।

शायद ….अब ,न्याय मिलेगा !

क्योंकि गूंगे और बहरे लोकतंत्र में, न्याय के लिए मरना जरूरी है !

मगर ,बेटियों को सुरक्षित समाज दे पाना, आज भी इस के लिए गैर-ज़रूरी है ।

कुछ दिन रोष प्रकट कर , सब निर्लिप्तता से आगे बढ़ जाएँगे ,

मगर सक्रिय रहेंगे ,दरिंदे !

एक औरत के हाथ से ,अपनी पेट की भूख मिटा ,

लपलपाती जीभ से तैयार , एक नए हाड़- माँस के शिकार के लिए ....!

और ,फिर वही चक्र और मुर्दा शांति ...!

क्योंकि हम असमर्थ हैं , सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए !

परमजीत कौर

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