धूप छाँव और प्रभु कृपा

05 अक्तूबर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (422 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप छाँव और प्रभु कृपा

■□■धूप छाँव और प्रभु कृपा■□■

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धूप का प्रचण्ड ताप

देह जला भी सकती है।
भादो मास में धूप दिख

आह्लादित करती है।।


छाया तले आ पथिक को

शितलता मिलती है।
छाया पड़ती दुख की तो ये

आँखें झड़ती हैं।।


प्रभूवर! कई भक्त तुम्हें

पाने हेतु लालायित रहते हैं।
जप-तप-कीर्तन और

सारी रात जागरण करते हैं।।


योगी बन 'विहंगमयोग' में

खो कर भी रिक्त रह जाते हैं।
तुम्हें पाने के लिए क्यों?

सभी लगे रहते हैं।।


तुम्हारी चाह लिए भक्तगण-

सारी रात जगे रहते हैं।
शुभागमन् हेतु आशान्वित

मन को सांत्वना देते हैं।।


कुछ भक्त मधुर कण्ठों से

गीत गा कर भी अपनी
मनोव्यथा व्यक्त करनेे की

चेष्टा में असफल होते हैं।
तुम्हारे सामिप्य का अभाव

बहुत खलता तो रोते है।।


कुछ भक्त तुम्हारी याद में
द्रवित-

अश्रुपूरित हो रुदन करते रहते हैं।
कुछ तो माया में लिपटे रह भी

तुमको बिसरा नहीं पाते हैं।।


तुम्हारा सानिध्य मानो

अब स्वप्न सम हुआ है।
ध्यान- जप- श्रवण-

मनन- चिंतन- दान- पुण्य से
अन्तरंगता- मधुरिम

संबंध प्रगाढ़ बना न पायें हैं।।


कई लोग युग - युगांतर से

माला गुँथ अर्पित करते हैं।
बाट जोहते- कि कब तुम

आओ- परन्तु नहीं पाते हैं।।


लोगबाग भूतकाल की

डफली बजा- समय गवाँते हैं।
परंपरा और अंधविश्वास ढ़ो

कर भ्रांत हो रह जाते हैं।।


कुछ चतुर लोग तुम्हारे साथ

धूप-छाँव का खेल- खेल रहें हैं।
भक्तगण तुमको सब कुछ दे

धूप-छाँव सह खुश हीं रहते हैं।।
कभी वे तुमको दूर तो

कभी नज़दीक समझ पा रहे हैं।
कभी वे संसार के रहस्यों में

उलझ आसक्त हो जाते हैं।।


कुछ लोग तुम्हारी अनुभूति हेतु

मानव जीवन व्यतीत कर देतें हैँ।
वे भक्त धन्य- जो तुम्हारी अहैतुकी कृपा से आप्लावित होते हैं।।

🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
डॉ. कवि कुमार निर्मल
बेतिया, बिहार


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