विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल

07 अक्तूबर 2020   |  अशोक सिंह   (402 बार पढ़ा जा चुका है)

विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल

विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल


हम किसान हमें खेती प्यारा

हम कुछ भी उगा सकते हैं

इस जग में दूजा काम नहीं

जो मेरे मन को भा सकते हैं।


हम उस किसान के बेटे हैं

संभव है तुझको याद नहीं

जय जवान जय किसान का नारा

बिल्कुल तुझको है याद नहीं।


ईमानदारी जिसके रग-रग में समाया

बेमिसाल ऐसा इनसान कहाँ

सादा जीवन और उच्च विचार हो

मिलता ऐसा गुदड़ी का लाल कहाँ...?


इस धरती पर हमने अब तक

शास्त्री जैसा जननेता न देखा

काम किसी का भले न किये हो

पर भूखा न किसी को लौटाते देखा।


जब उत्तर में दुश्मन

रण की तृषा लिए आया

तब लालबहादुर ने फिर

अपना बिगुल बजाया

जता दिया दुश्मन को कि

ऐसा फौलादी सीना है यहाँ….।


जो नफरत की आग जलाते हो

हम बुझा उसे भी सकते हैं

गर अमन चैन न भाता हो तो

हम विध्वंस प्रलय ला सकते हैं

हर हर बम बम के नारों से

घाटी को दहला सकते हैं….।


हमसे लड़ने को रावण था चला

सोने की लंका को जला डाला हमनें

राह देने से सागर जब अड़ा

तब रामसेतु बना डाला।


भूचाल हमारे पैरों में है

तो तूफ़ान बंद है मुट्ठी में

हर हर बम बम के नादों से

तांडव भी दिखला सकते हैं

दुश्मन भी डरकर थर्राया था

ताशकंद समझौता करवाया था

लड़कर नहीं जीत सका तो

कूटनीति को अपनाया था...।


शहीद तो हो गए गुदड़ी के लाल

ताशकंद की बलिबेदी पर

पर ऊँचा कर गए माँ का भाल

सदा हिमालय की चोटी पर

चिर समाधि में चले गए..

विशुद्ध किसान गुदड़ी के लाल….

पर जाते-जाते ऊँचा कर गए माँ का भाल....।


➖ प्रा.अशोक सिंह....🖋️

☎️ 9867889171

अगला लेख: रिज़वी महाविद्यालय में हिंदी काव्य-पाठ का आयोजन संपन्न



हमारे किसान गुदड़ी के लाल सदैव संकट के समय देश की और जनता की रक्षा करने में आगे रहे हैं । जिनके योगदान को हम सभी सर्वोपरि मानते हैं और कभी भी इनके भिन्न भिन्न रूपों को भूला नहीं सकते है।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
03 अक्तूबर 2020
महाराष्ट्र राज्य कनिष्ठ महाविद्यालय हिंदी अध्यापक संघ मुंबई विभाग द्वारामहात्मा गाँधीजी की जयंती के उपलक्ष्य में वेबसंगोष्ठी का आयोजन" महाराष्ट्र राज्य कनिष्ठ महाविद्यालय हिंदी अध्यापक संघ मुंबई विभाग द्वारा 'महात्मा गाँधीजी जयंती व शास्त्री जयंती के अवसर पर वेबसंगोष्ठी का आयोजन दिनांक 2 अक्टूब
03 अक्तूबर 2020
25 सितम्बर 2020
रिज़वी महाविद्यालय में ऑनलाइन मंच के माध्यम से दो दिवसीय 'हिंदी काव्य-पाठ समारोह' सम्पन्नरिज़वी महाविद्यालय कला, विज्ञान एवं वाणिज्य के कनिष्ठ महाविद्यालय हिंदी विभाग के तत्वाधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में दो दिवसीय 'हिंदी काव्य-पाठ समारोह' का आयोजन संपन्न हुआ। दोनों दिन समारोह का शुभारंभ सरस्वती
25 सितम्बर 2020
25 सितम्बर 2020
तुम खुशबू हो तो मैं हवा हूँ तुम भावना हो तो मैं विश्वास हूँ तुम धड़कन हो तो मैं सांस हूँ तुम ग़ुलाम हो तो मैं दास हूँ तुम आसमान हो तो मैं धरती हूँ तुम कमीज़ हो तो मैं धोती हूँ तुम लहसुन हो तो मैं पोती हूँ तुम धैर्य हो तो मैं शांति हूँ तुम आंदोलन हो तो मैं क्रांति हूँ।
25 सितम्बर 2020
06 अक्तूबर 2020
का
कान की व्यथा कान की जुबानी इस दुनिया में कोई पूर्ण नहीं है… सभी अपूर्ण हैं। कोई सुखी नहीं है सभी दुखी हैं। जिसके पास सबकुछ है फिर भी वो उसका भोग आनन्द पूर्वक न करके जो नहीं है या जो अप्राप्य है उसके लिए दुखी है। सभी के मन में कोई न कोई व्यथा है जिसने आहत कर रखा है। औरों की बात तो छोड़ो एक दिन कान बेच
06 अक्तूबर 2020
25 सितम्बर 2020
होने दो हवा को चलने दो बारिश को आने दो शेर को खाने दो जो हो रहा होने दो बादल बनेंगे बिगड़ेंगे तूफान आयेगा जाएगा मुझे इससे क्या लेना जो हो रहा होने दो कोई भूख से रोता है तो कोई अन्याय से तो क्या ?इनको रोने दो जो हो रहा है होने दो किसी को वोट की पड़ी है तो किसी को देश भक्ति की बाढ़ से किसी
25 सितम्बर 2020
14 अक्तूबर 2020
"उठो बहना शमशीर उठा लो..."उठो बहना शमशीर उठा लोसोयी सरकार न जागेगीहर घर में है दुःशासन बैठाऔर कब तक तू भागेगी...?समय आ गया फिर बन जाओतुम झाँसी की रानीशमशीर उठाकर लिख डालोएकदम नई कहानीमरते दम तक याद रहेसबको एकदम जुबानी....।उठो बहना शमशीर उठा लोबन जाओ तुम मरदानीकोई नज़र
14 अक्तूबर 2020
25 सितम्बर 2020
सारा जहाँ प्रेम का भूखा है जहां मिला वहां झुका है जो खुद से प्रेम नहीं करता वो दूसरों से क्या प्रेम करेगा ?जो खुद का ज़ख्म नहीं भरसकता वो दूसरों का क्या भरेगा ?जो खुद खुश नहीं रह सकतावो दूसरों को खुश रखने का वादा करेगा खुशी खुद में है यह ढूढ़ने का ना इरादा करेगाजो खुद से प्रेम नहीं करता वो दूसरों से क
25 सितम्बर 2020
26 सितम्बर 2020
हे
हे कवि मन, हिंदी की जय बोलजिसने निजभाषा का मान बढ़ायाहिंदी को जन - जन तक पहुँचायाराजभाषा का दर्जा भी दिलवायाहे कवि मन, हिंदी की जय बोल।जो घर-घर में बोली जाती हैजो सबके मन को हरसाती हैसभी जाति धरम को भाती हैहे कवि मन हिंदी की जय बोल।जिसके बावन अक्षर होते हमारेकवि जिससे प्रकृति को चितारेजो जनमानस के भा
26 सितम्बर 2020
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x