बहुत याद आता है.. वो गुजरा जमाना

08 अक्तूबर 2020   |  अशोक सिंह   (403 बार पढ़ा जा चुका है)

बहुत याद आता है.. वो गुजरा जमाना

बहुत याद आता है..वो गुजरा जमाना...


बहुत याद आता है, वो गुजरा जमाना
वो बीता बचपन, हरकतें बचकाना
आपस में लड़ना, फिर रूठना-मनाना
चंदा मामा का आना, खाना खिलाना
सुबह का कलेवा, वो बासी खाना
जिसके बिना दिन, लागे सूना-सूना।


दादा-दादी के पास, नित होता था सोना
नीदिया रानी का आना, चुपके से सुलाना
परियों की कहानी का, नित होता सुनाना
तंग आकर दादी का, फिर हमको डराना
बरम बाबा डीह बाबा, को था मनाना
दूसरे दिन जाकर के, सिन्नी चढ़ाना।


बड़े मन से स्कूल, को होता था जाना
जहाँ गोविंद मास्टर, का होता पढ़ाना
वही ककहरा और, पहाड़े का रटाना
पटरी घोटारना फिर, उसपर लिखाना
सुलेख लेखन का था, वो भी जमाना
इसी से लिखावट का, होता था तराना।


वो बचपन की शरारतें, और होती पिटाई
रास्ते में होती खूब, गन्नों की चुसाई
अक्सर सुनने को मिलता एक कहावत
पढ़ोगे लिखोगे तो, बनोगे नवाब
और खेलोगे कूदोगे तो, बनोगे खराब
गजब का था बचपन, हाँ बचपन लाजवाब।


बहुत याद आता है, चौओं का होना
मुर्गे की बाग और, गैया का रंभाना
अलाव के पास बैठ, ठंडी भगाना
पिल्लों का लड़ाना, बकरी का मिमियाना
बड़ेरी पर बैठ कौवे का, कांव कांव करना
संकेत होता था, मेहमानों के घर आने का।


खेतों में जाना और, हाँथ बटाना
निराई, खुदाई तो, कभी मेड़ चढ़ाई
हमारे नाम छूट जाता, खेतों का कोना
सिंचाई में भी होता, क्यारियों को लोनियाना
बीज बोवाई से, फसल कटाई तक
अपनी भी होती थी, छोटी सी भूमिका।


पाबंदी में भी मिलती थी, थोड़ी सी आजादी
गर्मी की दुपहरिया, बगीचे में बिताना
वो पेडों पर का चढ़ना, और चढ़ते जाना
दग्गो पर पहले अपना, अधिकार जमाना
पाने के लिए किसी भी, हद तक गुजरना
अपने जमाने का उसको, हापुस समझना।


बंसवारी में से गोजी, काटकर के लाना
महीनें भर तक उसको, तेल पिलाना
सेंक-सेंक करके उसको, फिर पकाना
गजब का वो होता था, पंचइया मनाना
कबडडी का खेल और, कूड़ी का कूदना
गजब याद आता है तिजहरियाँ का चबैना।


खेतों की हरियाली, फसलों की खुशिहाली
सरसो का इतराना, अलसी का अलसाना
गेहूँ की बाली हो या, अरहर की फली
उसमें ही मन रमता, उसमें ही जीवन फबता
गजब का वो होता था, कटाई और मड़ाई
किसान भी हमेशा देता, ईश्वर की दुहाई....।


हाँ भाई, बदला जमाना, अब फेर खा गया
बैलों की जोड़ी छोड़, ट्रैक्टर-हार्वेस्टर आ गया
उपलों को छोड़ गैस, रसोईं घर में छा गया
मेहनत छोड़ आदमी, आरामतलब बन गया
कलेवा के बदले, ब्रेकफास्ट आ गया
बच्चे की परवरिश, करती है आया
माया की गोदी में, डॉगी-टॉमी आ गया।


याद आता है वो कच्चा मकान,
जिसमें होता था एक बड़ा सा आँगन
रिमझिम बरसता जिसमें, मनभावन सावन
अब तो वहाँ पर भी, पक्का मकान बा
ईंट सीमेंट कांक्रीट, चहुँ ओर छाये बा
बरही के दावत छूटा....तेरही की पूरी..
अब तो ये जीवन लागे है जैसे मजबूरी।


बहुत याद आता है, वो गुजरा जमाना
बासी रोटी तुम छोड़ो, ब्रेड-पाव आ गया
राम-रामजी के बदले, गुड मॉर्निंग आ गया
ऐजी-ओजी छोड़ो तुम, बेबी डार्लिंग आ गया
अब घर में ही तो, सारा मॉडलिंग आ गया
कितना सबकुछ बदला, औ बदला जमाना
बहुत याद आता है, वो गुजरा जमाना....।

➖ अशोक सिंह
☎️ 9867889171





बहुत याद आता है.. वो गुजरा जमाना

अगला लेख: रिज़वी महाविद्यालय में हिंदी काव्य-पाठ का आयोजन संपन्न



आलोक सिन्हा
12 अक्तूबर 2020

एक बहुत अच्छी सराहनीय रचना |

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