नौकरी का भूत

11 अक्तूबर 2020   |  अभिनव मिश्रा"अदम्य"   (410 बार पढ़ा जा चुका है)

नौकरी का भूत

[12/09/2020 ]

*नौकरी का भूत*

(व्यंग्य-कविता)


पढ़ लिख के मैं बड़ा हुआ जब,

ये मन में मैने ठाना ।

जिन सब का था कर्ज पिता पर,

वो मुझको जल्द चुकाना ।

नौकरी की आस को लेकर,

निकला घर से मतवाला ।

सफल सफर करके भैया मैं,

पहुच गया हूँ अम्बाला।

***

दो महिनें तक करी नौकरी ,

मन को थी कुछ ना भायी ।

पता चला कुछ भर्ती निकली,

दिल पे सब की थी छायीं ।

फौजी बनने की मेरे मन,

भी एक लालसा आयी ।

अब तो फौजी बन जाऊंगा,

मन एक उमंग सी छायी ।

***

फ़ौरन बैठ लिया हूँ बस पर,

पहुंचा गया मैं बरेली ।

देखा वहीं लगा रहे लड़के,

एक लम्बी सी रेली ।

नाप जोख में फिट निकला मैं,

रेश लगाने की बारी ।

रेश में भी उत्तीर्ण हुआ मैं,

खुशियां मन में अति भारी ।

***

किन्तु दुबारा नाप जोख की,

फिर से की है तैयारी ।

लम्बाई में कम निकले हम,

दुःख था मन में अति भारी ।

नौकरी आस हुई न पूरी,

वापस अब घर को आया।

जीवन यापन करने को अब,

कॉलेज में है पढ़ाया ।

***

थोड़ी उन्नति करके अब मैं,

खुद का स्कूल चलाता हूँ ।

यही नौकरी है अब मेरी,

खुद का दिल बहलाता हूँ ।

इसी तरह से मैं अपना अब,

जीवन यापन करता हूँ ।

समय कहीं मिलता है मुझको

कविता लिखता रहता हूँ ।


स्वरचित✍️

अभिनव मिश्र"अदम्य"

(शाहजहांपुर)


नौकरी का भूत
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