जिंदगी

16 अक्तूबर 2020   |  सीताराम   (414 बार पढ़ा जा चुका है)
शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
13 अक्तूबर 2020
मा
चरणों में पुष्प अर्पण करूँहे माँ तेरा ही तेरा दर्शन करूँ मेरा पहला शब्द है माँ मुझे जीवन देने वाली माँ हर संकट में याद आये वो माँ चोट लगने पर मुंह से निकलता माँ तेरी भी माँ मेरी भी माँ जग तुझसे बना माँ जहाँ जाऊँ जिधर जाऊँप्रेम की मूर्त माँ को पाऊँ इस दुनिया में कितना भी अच्छा ख
13 अक्तूबर 2020
28 अक्तूबर 2020
दू
दूर ना जाना ,पास आनाविचारों के सागर में संग ग़ोता लगाना मनमोहक सपने दिखाना सपनों में मंजिल को खोजते हुए रास्तों से इश्क हो जाना मंजिल के मिल जाने पर भी रास्तों से मोह न जाना यह कुछ वैसा ही है जैसे मृत्यु रुपी मंजिल तक जानाऔर पथ रूपी जिंदगी से लगन लग जाना।
28 अक्तूबर 2020
11 अक्तूबर 2020
सप्तक के स्वरों की स्थापना सर्वप्रथम महर्षि भरत के द्वारा मानीजाती है | वे अपने सप्त स्वरों को षड़्ज ग्रामिक स्वर कहते थे | षड़्ज ग्राम सेमध्यम ग्राम और मध्यम ग्राम से पुनः षड़्ज ग्राम में आने के लिये उन्हें दो स्वरस्थानों को और मान्यता देनी पड़ी, जिन्हें ‘अंतर गांधार’ और ‘काकली निषाद’ कहा गया| महर्
11 अक्तूबर 2020
08 अक्तूबर 2020
अपना क्या है कभीकभी यों ही दार्शनिक सा बना मन सोचने लगता है कि इस असत् जगत में उसका है क्या...?जो कुछ है वो सब उसी का तो दिया हुआ है... कुछ इसी तरह के उलझे सुलझे से विचारोंके साथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना... अपना क्या है... सुनने के लिए कृपयावीडियो पर जाएँ... धन्यवाद... कात्यायनी... https://youtu
08 अक्तूबर 2020
13 अक्तूबर 2020
लो
लोट आओ है गाँधी तेरा भारत तुझे पुकारे स्वराज का सपना अधूरा स्वराज के दुलारे।
13 अक्तूबर 2020
15 अक्तूबर 2020
सु
सुबह से शाम हो रही है न्याय के लिए आँखें रो रही है कभी निर्भया तो कभी हाथरस जैसी घटनाए हर रोज हो रही है लगता है आज कल धरती पर मानव तो है लेकिन मानवता धीरे धीरे जग से खो रही है किसको फर्क पड़ता है यहां न्यायपालिका में लाखों मुकदमे विचाराधीन है निर्दोष भी कारा गृह में मौन है अब यह गाँधी का देश नहीं है
15 अक्तूबर 2020
19 अक्तूबर 2020
है
है मनुष्य इतना घमंड ना कर प्रकृति का तू दमन ना कर यह जग सबका है पशु पक्षियो को खत्म ना कर यह जीव जंतु दुश्मन नहीं तेरे साथी है इनके बिना तू कुछ नहीं यह तेरे जीवन के बाराती है पंछी चाहे कितना ही ऊंचा उड़ जाए खाने के लिए धरती पर झोली फैलाए
19 अक्तूबर 2020
02 अक्तूबर 2020
दुनिया ना दबाव से जीती जाती है ना तलवार से दुनिया को बदलना काफ़ी है एक विचार सेजिसके पास धन है दौलत है शोहरत वह अमीर नहीं जिसके पास मुस्कुराने के दो पल है अमीर वहीं। ..
02 अक्तूबर 2020
12 अक्तूबर 2020
जीवन मेंअनगिनती पल ऐसे आते हैं जब माता पिता की याद अनायास ही मुस्कुराने को विवश कर देतीहै | ऐसा ही कुछ कभी कभी हमारे साथ भी होता है | माँ क्या होती है – इसके लिए तोवास्तव में शब्द ही नहीं मिल पाते | माँ की जब याद आती है तो बस इतना ही मन करताहै: माँ तेरी गोदीमें सर रख सो जाऊँ मैं पल भर को, तो लोरी तू
12 अक्तूबर 2020
11 अक्तूबर 2020
नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का अपने खून से तिरंगा सजाने का अपने देश के लिए अपनी जान गवाने का भारत माँ कि आन बान शान के लिए किसी से भी लड़ जाने का नशा है हमें तिरंगे में लिपटकर घर आने का।
11 अक्तूबर 2020
08 अक्तूबर 2020
वो एकतरफा प्यार ,जिसके लिये हुआ दिल बेक़रार मैं ढूंढता रहा उसे ,होकर बेक़रार उसका मुस्कुराना देखकर आँखों का झुकना देखकर उसके आगे लगने लगे महखाने सारे बेअसर वो जाते जिधर जिधर मैं पहुंचता उधर उधर जैसे मृग कस्तूरी के लिए ,भटके इधर उधर अब तो दिन कटता था ,रस्ता उनका देखकर उनसे मिलने का मौका ढूंढता था ,दिल
08 अक्तूबर 2020
01 अक्तूबर 2020
तु
तुम बताओ कैसे भूल जाऊँ तुझे जिसने प्यार का अर्थ बताया मुझे //
01 अक्तूबर 2020
08 अक्तूबर 2020
अं
तुम्हें नहीं लगता हम यूँ ही दुःखी है सब ठीक होने पर भी जिंदगी रुखी है मैं कौन हूँ ?,मैं क्या हूँ? ,कहाँ जाना है? ,मेरा लक्ष्य क्या है ?यह सवाल मैं खुद से करता था लेकिन आज वक्त बदल गया है आज खुद के लिए वक्त नहीं है हाथ में घड़ी है लेकिन खुद के हाथ में एक घड़ी पल नहीं है क्यों क्या हम यहां सुविधा भ
08 अक्तूबर 2020
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