धूप शरद की

07 नवम्बर 2020   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (445 बार पढ़ा जा चुका है)

धूप शरद की

शरद ऋतु की कोमल मुलायम सी धूप... ध्यान से देखेंगे तो अनगिनती रूप... रंग और भाव दीख पड़ेंगे... कभी किसी नायिका सी... तो कभी श्वेत कपोत सी... तो कभी रेगिस्तान की मृगमरीचिका सी... कुछ इसी प्रकार के उलझे सुलझे से भावों के साथ प्रस्तुत है हमारी आज की रचना... धूप शरद की... कात्यायनी...

https://youtu.be/hVjKTmkrjo8

भोर के केसर जैसी लालिमायुत रश्मि पथ पर

धीरे धीरे आगे बढ़ता / ऊपर उठता सूर्य

देता है संदेसा कि उठो, जागो मीठी नींद से

देखो, पत्तों पर गिरे मोती भी अब पिघलने लगेंगे

भय से सूर्यकरों के छँटने लगेगा निशा का मायावी अन्धकार

और चहचहाने लगेंगे पंछी

सुनाते हुए रात के सपनों की रंगीन कहानियाँ

तब आँगन में खिल उठेगी सुखद सुनहरी धूप शरद की
जो लगती है कभी माँ की स्नेहसिक्त कोमल गोदी सी
जिसमें बैठते ही उतर आए आँखों में नींद मीठी सी...
कभी रातरानी की भीनी सी खुशबू लुटाती
तो कभी गुलाबों की रंगत सी बिखराती...
कभी किसी सुकन्या की नाईं अल्हड़ मुस्कान सी
तो कभी किसी नवोढ़ा की भाँति शर्माती लजाती...
कभी प्रेम में सुध बुध भूली मुग्धा सी
तो कभी नेहडगर पर सम्हल कर चलती धीरा सी...
कभी प्रगल्भा की भाँति हँसती खिलखिलाती
तो कभी किसी खण्डिता सी कुपित होती अपने प्रियतम पर...
कभी षोडश श्रृंगार किये पिया मिलन को जाती अभिसारिका सी
तो कभी रातरानी से सुगन्धित सेज सजाए वासकसज्जा सी...
कभी विरह में व्याकुल विराहोत्कंठिता सी
तो कभी ठगी सी खड़ी विप्रलब्धा सी...
कभी हिमाच्छादित शिखरों पर बिखरी मुक्तामणि सी
तो कभी शुष्क धरा पर जल का आभास देती मृगमरीचिका सी...
कभी आती उछलती खुशी से
तो कभी छिप जाती किसी पेड़ की ओट में...
कभी खिड़की पर बैठे श्वेत कपोत सी
तो बादलों की छाँव में विश्राम करते चाँद सी...
कितने रंग और रूप धरे धूप ये शरद की
भाती है तन को... लुभाती है मन को...

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