लड़की बोझ!

09 नवम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (457 बार पढ़ा जा चुका है)

लड़की बोझ!

••••●ऐसा क्यों होता है?●•••


मैं जब आई माँ की गोदी में

बहुत हाथ-पैर चलाई
थक -थका कर मुझे

गहरी नींद जब थी आई
चट-पट पलने में सुला

मुझसे माँ पिण्ड छुड़ाई
पापा-चाचा-ताऊ ने

जी भर खिलाया-
हुई संग बाजार धुमाई
चलना सिखी तब छत पर
नीली-पीली पतंग बहुत उड़ाई
भाई बहनों संघ जब-तब झड़प और
प्यार भरी लड़ाई
सखियाँ बनी कई तो कोने में
बैठ कर मन की बात बताई
आई तरुणाई तब दुबकी घर में-
गली की ओर न पाँव बड़ाई
पाठशाला का नित चक्कर-
मास्टर-मिस की जेब तब डंटाई
उभरा यौवन! सिमट कपड़ों में
लिपट अपने को भरसक छुपाई
माँ बाबूजी को मैं हुई शायद भारी-
हुई दूर का देख मेरी सगाई
अनजानों के संग जोड़ा में
आनन-फानन हुई

अनजानों संग विदाई
नये-नये कद-चेहरों के बीच-
सास-ननद-जेठानी की
सीख बस कानों तक आई
चौके में संग-संग वे करती

रोटी कीबेलाई-सेकाई
ताख पर जा अटकी
स्कूल-कॉलेज की सारी पढ़ी पढ़ाई
सरकारी नौकरी कई बार आ खुद
दरवाजा खटखटाई
पती कमाऊ, ससुर दबंग- क्यों (?)
बहु घर से बाहर करे कमाई
कभी पतिदेव से खटपट कभी
ससुर की डपट झड़ाई
''बहुत बुरी फंसी'' बोली जब
राखी पर आया मेरा भाई
बताओ मुझको मेरा दोष (?)
जरा मेरे प्यारे-प्यारे भाई
लड़की हुई तो रोना-धोना,
लड़का हुआ तो गुँजी शहनाई
लड़कों संग भी कहीं ऐसा सब
क्यों कहीं होता है रे भाई?


डाॅ. कवि कुमार निर्मल


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02 नवम्बर 2020
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