रौशनी का त्योहार

15 नवम्बर 2020   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

रौशनी का त्योहार

साहित्य मित्र मंडल, जबलपुर

(व्हाट्सऐप्प्स् समुह संख्या: १ - ८)

रविवासरीय प्रतियोगिता में '

'श्रेष्ठ सृजन सम्मान ''

हेतु चयनित मेरी रचना

दिनांक: १५.११. २०२०

विषय: रोशनी का त्योहार

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रौशनी का त्योहार दीपावाली- सबको है भाता।।

कोई लक्ष्मी पूजन करता,

कोई बड़ा दिन कह मनाता।।


रौशनी फैला कर हर ओर

आलोक से जग भर जाता है।

कहीं दीया तो कहीं बल्बों की

लड़ियों से हर घर सजता है।।


अर्थ गूढ़ है इस मिट्टी के दीये-

तेल- बाती- प्रज्वलन का।।

आलोकित दीपक है

चिन्ह जीवन एवंआत्म ज्ञान का।।


दीपक सजाना है आह्वान-

ऐक्यभाव और प्रगति का।।

आलोकित सूर्य का और

चाँद तारों के परावर्तन का।।


तेल पँचतत्व का देह सम,

आधार है यह दिपक प्राणवायु का।

बाती का मतलब है जन्म ले कर

चरैवेति मंत्र अपनाने का।।


स्वरक्षा हेतु कर्म करना हीं

'मानव धर्म' कहलाता है।

संसाधन हेतु अर्थ का महत्व

समझ में हमें आता है।।

'सभी हों सुखी', हर अवतार आशीर्वाद दे जाता है।।।


लक्ष्मी होती चंचला

यही हर धर्म ग्रंथ बतलाते।

दीपावाली मनाना धनोपार्जन कर आपूर्ति धर्म अपनाले।।


धन संचय वर्जित है अनाधकृत-

अथर्व वेद कहता है।

ऋचाओं का मर्म यही है

कि धनाढ्य शोषक होता है।।


वैश्योचित् धर्मवत्ता अर्थ दर्शन-

व्यर्थ किंवा लोलुपता है।

'सर्वजन हिताया - सर्वजन सुखाय' संविधान भारत का कहता है।।


फिर क्यों भारतवर्ष में अमीर - गरीब का रोना गाया जाता है?

धन के व्यापार से नेता राजा बन आर्थिक असमानता लाता है!


कबीरदास वाणी उत्तम-

सद्गुरु जिनको मिल जाता है।

जन्म-मरण चक्र से मुक्त हो

मानव मोक्ष द्वार तक जाता है।।


यह शुभपरंपरा है पापशक्ति पर

धर्म की वीजय की।

दीपोत्सव है प्रथा सत्यम् -

शिवम् एवम् सुंदरम् की।।


तमसामुक्त हो मन में सत्य की

आभा से भर जाने की।

नहीं संग्रहित धन की आरती

उतार धनी कहलाने की।।


अपव्यय है सर्वथा अनुचित-

यह है बात गूढ़ समझ समझाने की।

दीन हीन न बच पाए एक-

विवेकपुर्ण वितरण सुनिश्चित करने की


रौशनी का त्योहार यह

दिपावाली- सबको है भाता।

कोई लक्ष्मी पूजन करता,

कोई बड़ा दिन कह मनाता।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल



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