मेरा ख़्वाब माँगते हैं ...

04 दिसम्बर 2020   |  मदन पाण्डेय 'शिखर'   (218 बार पढ़ा जा चुका है)

मेरा ख़्वाब माँगते हैं ...

इतने वेवश चेहरे, कि नकाब माँगते हैं,

बंद करूँ आँखें , मेरा ख़्वाब माँगते हैं ।

बचपन की यादें ,जवानी के लुक –छिपे,

ये चोरी –चोरी, मेरी किताब माँगते हैं

छुपा छुई –मुई में, हर –सिंगार में फँसा,

इम्तहान लेते मेरा , ये गुलाब माँगते हैं ।

दर्द की झाइयाँ नर्म, पलकों की सिंहरन,

मज़ाक बनाते हैं मेरा , शबाब माँगते हैं।

सीरत संभाल कर इतनी ,रखी नहीं गई ,

अश्क नज़र क्या आया, शराब माँगते हैं ।

मोहब्बत तो की, इज़हार करना नहीं आया,

सारी उम्र फिसल गयी, ख़िज़ाब माँगते हैं ।

मदन पाण्डेय शिखर

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