मां

05 दिसम्बर 2020   |  Raj Kumar Jaiswal   (28 बार पढ़ा जा चुका है)

मां

माँ! तुम्हारी बस इतनी सी कहानी।

दर्द-दुख-सुख-बच्चे औ, कुर्बानी।


जन्म देकर जननी जब तुम बन गई।

मानो खुद की खुद से ही ठन गई।


अपने सपने और शौक हुए पुराने।

बच्चों के सुख-दुख निज तुमने माने।


नौ माह कोख और जनन की पीड़ा।

तुम सह गए समझ प्रिय-बाल-क्रीड़ा।


तुमने समझ सही मारे और समझाए।

जब-जब पैर हमारे थे कुमार्ग पे आए।


इस दुनिया की सुंदरता और मेरा अस्तित्व।

तुमसे ही सम्भव है, जो कुछ मैं व्यक्तित्व।



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