जीव और जगत

22 दिसम्बर 2020   |  अजय अमिताभ सुमन   (428 बार पढ़ा जा चुका है)



जीव तुझमें और जगत में, है फरक किस बात की,

ज्यों थोड़ा सा फर्क शामिल,मेघ और बरसात की।


वाटिका विस्तार सारा , फूल में बिखरा हुआ,

त्यों वीणा का सार सारा, राग में निखरा हुआ।


चाँदनी है क्या असल में , चाँद का प्रतिबिंब है,

जीव की वैसी प्रतीति , गर्भ धारित डिम्ब है।


या रहो तुम धुल बन कर ,कालिमा कढ़ते रहो,

या जलो तुम मोम बनकर , धवलिमा गढ़ते रहो।


पर परिक्षण में लगो या, स्वयम के उत्थान में,

या निरिक्षण निज का हो चित ,रत रहे निज त्राण में।


माँग तेरी क्या परम से , या कि दिन की ,रात की,

जीव तुझमें और जगत में,बस फरक इस बात की।


अजय अमिताभ सुमन

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