सर्द रात के ढलते ढलते

04 जनवरी 2021   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

सर्द रात के ढलते ढलते

माघ पूस की सर्द रात के ढलते ढलते
कोहरे की चादर में लिपटी धरती / लगती है ऐसी जैसे
छिपी हो कोई दुल्हनिया परदे में / लजाती, शरमाती
हरीतिमा का वस्त्र धारण किये
मानों प्रतीक्षा कर रही हो / प्रियतम भास्कर के आगमन की
कि सूर्यदेव आते ही समा लेंगे अपनी इस दुल्हनिया को
बाँहों के घेरे में...

पूरी रचना सुनने के लिए कृपया वीडियो पर जाएँ... कात्यायनी...

https://youtu.be/HL6D0_652Sk

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