माँ के आशीष बिना जीत कहाँ होती है,I

14 जनवरी 2021   |  मदन पाण्डेय 'शिखर'   (876 बार पढ़ा जा चुका है)

माँ के आशीष बिना जीत कहाँ  होती है,I

माँ

जिस्म से रूह तक ,एक-एक रुआँ होती है,

वो तो माँ है सारी, दुनियाँ से जुदा होती है,

उसकी प्यारी सी, थपक आँख सुला देती है,

माँ तो पलकों से, भर- भर के दुआ देती है

ये जो दौलत है, बेखोफ़ जिगर, शौहरत, है

माँ के आँचल की, हल्की सी हवा होती है I

चाहे दुनियाँ ही, रुके, सांस भले थम जाये,

माँ की ममता बहते जल सी दुआ होती हैI

मंदिरों के ये दिए, –फूल, देहरी के चावल,

हर मुश्किल को उड़ाती सी धुआं होती हैI

नाम अपना भी सिकन्दर,हो या जहाँ जाने,

माँ के आशीष बिना जीत कहाँ होती है,I

मदन पाण्डेय “ शिखर”

माँ के आशीष बिना जीत कहाँ  होती है,I

अगला लेख: माँ मुझे अच्छे से प्यार कर लेना



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x