प्रेम सुधा

01 फरवरी 2021   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (24 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रेम सुधा

हम सभी प्रायः अनन्त की बातें करते हैं, असम की बातें करते हैं, नवग्रहों और नवधा भक्ति आदि की बहुत सी दार्शनिक बातें करते हैं... मोक्ष की बातें करते हैं... लेकिन हम समझते हैं जिस दिन हमने समस्त चराचर में अपने दर्शन कर लिए... सबके साथ समभाव हो गए... उस दिन हमें कुछ भी बाहर खोजना नहीं पड़ेगा... उस दिन हम स्वयं ही समस्त चराचर पर प्रेम सुधा बरसाना आरम्भ कर देंगे... कुछ इसी प्रकार के भावों से युक्त है हमारी आज की रचना... प्रेम सुधा...

श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वन्दन

समा जाएँगे सब दास्य और साख्य भाव में

खो जाएगा तब उस परमात्मा में / जो है उसका ही आत्मतत्व
और नृत्य करेगा भूलकर अपना अस्तित्व / आह्लादित होकर
क्योंकि देख सकेगा सत्ता उस अनादि की / उस अनन्त की / उस असीम की
पूरी रचना सुनने के लिए कृपया वीडियो पर जाएँ... कात्यायनी...

https://youtu.be/cC4Ze9oVi8o

अगला लेख: वसंत पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएं



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
23 जनवरी 2021
सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी कल क्या हुआ कल क्या होगा यह मेरा है, वो तेरा इन्ही, सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी दुनिया क्या कहेगी यह सही वो ग़लत यह अच्छा वो बुरा इन्ही, सवालों और जवाबों के चक्रव्यूह में फँस गयी है ज़िंदगी २३ जनवरी २०२१जिनेवा
23 जनवरी 2021
21 जनवरी 2021
ठिठुराती भीषणठण्ड में जब प्रकृति नटी नेछिपा लिया हो स्वयं को चमकीली बर्फ कीघनी चादर में छाई हो चारों ओरघरों की छत पर और आँगन में खामोशी के साथ “टपटप” बरसती धुँध नहीं दीख पड़ता किचादर के उस पार दूसरा कौन है और फिर इसीद्विविधा को दूर करने धीरे धीरे मीठीमुस्कान के सूर्यदेव का ऊपर उठना जो कर देता हैखिलखि
21 जनवरी 2021
25 जनवरी 2021
ॐ सहनाववतु । सहनौ भुनक्तु । सहवीर्य करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तुमा विद्विषावहै । - कृष्ण यजुर्वेद हम सबसाथ मिलकर कार्य करें, साथ मिलकर अर्थात एक दूसरे के प्रति स्नेह की भावना मन में रखतेहुए भोग करें, साथ मिलकर शौर्य करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, किसी प्रकार काद्वेष भाव मन में न हो... कृष्ण यजुर्वेद
25 जनवरी 2021
18 जनवरी 2021
आसाँ नहीं समझना हर बात आदमी के,कि हँसने पे हो जाते वारदात आदमी के।सीने में जल रहे है अगन दफ़न दफ़न से ,बुझे हैं ना कफ़न से अलात आदमी के?ईमां नहीं है जग पे ना खुद पे है भरोसा,रुके कहाँ रुके हैं सवालात आदमी के?दिन में हैं बेचैनी और रातों को उलझन,संभले नहीं संभलते हयात आदमी के।दो गज
18 जनवरी 2021
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x