अग्नि सा जीवन

08 मार्च 2021   |  नीतू टिटाण   (438 बार पढ़ा जा चुका है)





तेरा अग्नि सा जीवन, सम्मान की अभिलाषी तू,

रही छल से अनजान, अपमान की फिर भी क्यों अधिकारी तू?


न समझ सके नारी के शोषित मन को,

न कोई तुमने संस्कार समझा।


द्रौपदी को चौसर में जीत दुर्योधन ने

उस पर अपना ही अधिकार समझा।


है आज का दृश्य भी यही सब बैठे हैं पांडवो के किरदार में

सब बेबस, मजबूर, मूकदर्शक बैठ गए एक स्त्री के निर्वस्त्र होने के इन्तजार में


अपने ही लहू से अब तुझे खुद को जन्म नया देना होगा

कृष्ण का इंतजार न कर, अब तुझे ही अपना इंतकाम लेना होगा।


एक बार जो तू ठान ले तो कोई भी तुझे टोक नहीं सकता

जैसे पत्थर भी बहते पानी को कभी रोक नहीं सकता


तू मन से हो मजबूत, जरूरत नहीं हथियार की


तू एक बार तो दिखा की नारी भूखी नहीं है प्यार की


कह दो कि दरिंदों से डरकर घूंघट न वो हिजाब रखेगी


जो बन गई दुर्गा तेरी एक एक बात का हिसाब रखेगी



एक बार जो गिरकर तू उठी तो वो सम्भल न पाएंगे


मरना भी नहीं चाहेंगे वो और ज़िन्दगी से भी ख़ौफ़ खाएंगे।



अगला लेख: तुमको काली भी बनना है।



आलोक सिन्हा
12 मार्च 2021

बहुत बहुत सुन्दर

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x