हालात बदले हुए है।

02 मई 2021   |  जानू नागर   (410 बार पढ़ा जा चुका है)

हालात बदले हुए है।

शाम दिल्ली में हवाएं रूप, बदल बदल कर आ रही थी। हवाओं ने नीम और जामुन के पत्ते फूल गिरा दिए।
चौक-चौराहे में लहराते, तिरंगों को फाड़ कर रख दिए।
बादलों की गर्जन से, आसमानी बिजली भी चमक गई।
काली खाली सड़को में, सायरन एम्बुलेंस के बज रहे।
किसी मे कराहती सासे, या कफ़न में लिपटी लाशें है।
बचपन अब भटकता नही, मुँह में मास्क चढ़ाए हुए।
गली गली में चर्चा है ऑक्सीजन के गोल सिलेण्डरों का।
इंसान छत पर खड़े थे, मुफ्त की ओ2 लेने के लिए।
बस खाली दौड़ रही, मेट्रो भी चढ़ाए गिनती की सवारियां।
मजदूरों के दायरे सिमट गए, गाँव जाने वाले निकल गए।
साइकिलें दौड़ रही है, मजदूर की हफ़्ती सासों के साथ।
डर-खौफ है इंसानों में, सरकार और कोरोना वायरस का

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