आज चाहूँ देखना वह नृत्य

12 मई 2021   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (407 बार पढ़ा जा चुका है)

आज चाहूँ देखना वह नृत्य

आज जिस प्रकार आतंक और भय का वातावरण दीख पड़ रहा है – चाहे वो कोरोना जैसी महामारी के कारण हो, या पिछले दिनों बंगाल में जिस प्रकार हिंसक घटनाएँ घटीं उनको देखते हुए हो – इस प्रकार के वातावरण में तो वास्तव में ईश्वर याद आता ही है सभी को... जो लोग दूसरों की ह्त्या करते हैं, या जो लोग ऑक्सीजन और दवाओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी करते दिखाई पड़ रहे हैं... उन्हें सम्भवतः लगता होगा कि वे स्वयं अमरत्व का पान करके आए हैं... लेकिन भूल जाते हैं वे लोग कि औघड़दानी महादेव शंकर भोले अवश्य हैं, किन्तु यों ही किसी को वरदान नहीं दे देते... उस वरदान में कहीं न कहीं कोई न कोई पेंच अटकाकर ज़रूर रखते हैं... तभी तो दुष्ट भस्मासुर समझ रहा था कि भोले बाबा ने उसे कभी न मरने का वरदान दे दिया है तो उसका तो वध हो ही नहीं सकता... लेकिन अनभिज्ञ था इस सत्य से कि उसका वरदान ही उसकी तनिक सी भूल से उसके लिए अभिशाप बन जाएगा... वह स्वयं अपनी ही अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा... तो ये दूसरों पर अत्याचार करने वाले, ये प्राणरक्षक दवाओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी करने वाले वैसे ही भस्मासुर हैं जो एक न एक दिन अपनी ही अग्नि में स्वाहा हो जाएँगे... लेकिन यह भी न भूलें कि कोरोना के कैसेज में शायद कमी आई है, किन्तु अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना है जीवन को पहले जैसा बनाने के लिए... उन लोगों को धन्यवाद देना चाहिए जो अपने आप आगे आकर लोगों की सहायता कर रहे हैं... कात्यायनी...

https://youtu.be/P52oX7YewhI

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