आशा

14 मई 2021   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (410 बार पढ़ा जा चुका है)

आशा

आशा


आशा है कोरोना अलविदा कह

हिया न और अब जलायेगा।

दर्पण है यह छाई "तमसा" का-

साथ अपने लिये जायेगा।।

आदि-अंत नहीं हो जिसका-

सिसकियाँ भर रह जाती हैं।

खौफ़नाक कहानी-

अंत हो नींद संग

धुल-मिल जाती है।।

शुरुआत हुई तो मुक़ाम भी बेशक-

साहिल से किश्ती टकरायेगी।

राह में काँटें हैं,

कारगर मरहम लगा नेह की-

नासूर भरके जायेगी।।

मनकायें बिखरी हैं तो

माला गुँथ एक में,

जप-तप से तमसा जाएगी।

कोरोना है पुरातन-

सन्नाटों से डर- फण कुचल पायेगी।।

मास्क और दूरी कायम कर

यह कड़ी टूट कर हीं

भारत बचा पायेगी।

हाहाकार मचा चहुँओर,

भेक्सिन सुनिश्चत की जायेगी।।


डॉ. कवि कुमार निर्मल




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