ये ही है वो संगीत

22 फरवरी 2018   |  नीरज अग्रहरि   (320 बार पढ़ा जा चुका है)

ये ही है वो संगीत

मेरे मन को झंकृत कर दे ,

आज लिखू मै ऐसा गीत |

फिर गाकर जिसको मेरा मन कहे ,

ये ही है वो संगीत |

पीने वाले रस को पीकर ,

न हो कभी भी भयभीत |

तभी मेरा मन कहे मुझसे ,

ये ही है वो संगीत |

और गाकर जिसको बंध जाये ,

मुझसे मेरा मनमीत |

क्यों न गाउ मै आज कोई ,

ऐसा संगीत |

नदिओं के बहती धारा के ,

कल - कल मै छिपा है एक संगीत |

जो किसी नई नवेली दुल्हन के ,

मन को दे नवगीत |

इस कविता को पढ़ने का तभी है मज़ा ,

जब तक की न मिले मुझे तेरी रज़ा |

आज एक भारतीय संगीत समारोह को देखकर ये कविता स्वयं ही बन गई |

' नीरज अग्रहरि '


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Anil Tuli
25 फरवरी 2018

कविता अच्छी है।

धन्यबाद अनिल जी

पंकज कुमार
23 फरवरी 2018

अच्छी कविता है पर थोड़ा और बढ़िया तरीके से लिखो तो और मजा जाए

जी बिल्कुल प्रयासरत हूँ |

रवि कुमार
23 फरवरी 2018

वाह , बहुत खूब

धन्यबाद रवि जी

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