तलाश

20 अगस्त 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

कतरन बनी जिन्दगी में भीड में अजनबियों के बीच अपने आप को खोजती टूटे सपनों को लडी को बिखरे रिश्तों को जोडने की जद्दोजहद आदर्शों, आस्थाओं को स्थापित करने का रास्ता खोजते मंजिलों पाने को घिसी पिटी, ढर्रे की रोजमर्रा की जिंदगी में विसंगतियों को संवेदनहीनता को उजागर कर एक नए उजाले को मिलना महज संयोग नहीं मुस्कुराने के बहाने पडतात करते वरना जिन्दगी क्या मौका पाते ही रूला के ही चैन लेती मृगमरीचिका की तरह सुकून की तलाश में बैचेन हो गई जिन्दगी सुखों की खोज में भटकती रास्ते रास्ते तभी पीछे से आवाज आई दुखों की हमारे बिना तुम्हारी अहमियत शून्य सम हम तुम सुख दुख के साथी बिना हमारे सुख कहा पाओगे बबीता गुप्ता

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