आचार्य विनोबा भावे की जीवनी

21 अगस्त 2018   |  अनघा जोगलेकर   (158 बार पढ़ा जा चुका है)

 आचार्य विनोबा भावे की जीवनी  - शब्द (shabd.in)

आचार्य विनोबा भावे


कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनका जीवन एक महागाथा की तरह होता है जिसे कुछ शब्दों में समेट पाना कठिन है। विनोबा भावे उन्ही में से एक हैं।


विनोबा वीर पराक्रमी योद्धा समान थे जिनके बारे में जितना लिखा जाए कम है। हमारे स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों की वीरगाथाएं पढ़ने को मिलती हैं परंतु आज की पीढ़ी में वे कहीं गुम ना हो जाए इसलिए उन्हें इतिहास के पन्नों से बाहर निकालना हम सबका दायित्व है। इसी सोच के साथ मैं अपना दायित्व निभाते हुए अपनी कलम से उन्हें पुनः जीवित करने का प्रयत्न कर रही हूं।


कहते हैं कि यदि अपने काम के प्रति सच्ची लगन, आत्मविश्वास और ईश्वर पर अटूट श्रद्धा हो तो कुछ भी कर पाना अस्मभव नहीं है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण महाराष्ट्र के एक छोटे-से गांव में जन्मा, एक साधारण परिवार का बालक है जो अपनी लगन, परिश्रम, परदुखकातरता, अहिंसा में विश्वास और देशभक्ति की भावना से विनायक से 'विनोबा भावे' बन गया।


विनोबा का जन्म महाराष्ट्र के गागोदा (जिला रायगढ़) नामक गांव में ११ सितंबर १८९५ में हुआ था। उनके पिता श्री नरहरि भावे गणित के विद्वान थे। रसायन शास्त्र में उनकी गहरी रुचि थी। उनकी माता रुक्मिणी बाई एक विदुषी महिला थी। उनके माता-पिता ने उनका नाम विनायक रखा था। उनके दो भाई थे जिनमें से बड़े का नाम शिवाजी व छोटे का वाल्कोबा था।

विनायक (विनोबा) के दादाजी शिव भक्त थे। उन्हें रोज प्रातः शिव की पूजा करते देख विनायक पर अध्यात्म के संस्कार पड़ने लगे। उनके घर में स्थित मंदिर में पंडित ‘ब्राह्मण शंभू राव’ हरिजनों को सहर्ष प्रवेश करने देते थे। उन्होंने ही विनायक को अहिंसा और परदुखकातरता का पहला पाठ पढ़ाया।

सर्वधर्मसमानता का पाठ भी उन्हें अपने परिवार से ही मिला। हिन्दू हो या मुसलमान, ब्राह्मण हो या हरिजन, सभी उनके घर में समान आदर पाते थे। उनकी माँ ने उन्हें श्लोकों का महत्व समझाया। वे प्रतिदिन माँ के साथ बैठ भावार्थ सहित गीता, उपनिषद के श्लोक बोला करते थे। माँ ने ही उन्हें प्रत्येक व्यक्ति में भगवान बसे होने का पाठ सिखाया। यह संस्कार बालपन से ही उनकी रगों में रक्त बनकर बहने लगे।


१० वर्ष की आयु में ही विनायक ने ब्रम्हचर्य व्रत का निर्णय ले लिया। वह तीन व्यक्तियों से बहुत प्रभावित थे। गौतम बुद्ध, रामदास स्वामी व शंकराचार्य। उन्होंने बाल्यकाल में ही ध्यान लगाना सीख लिया था। जूते, छतरी, गद्दी और स्वादिष्ट व्यंजनों का त्याग कर उन्होंने अपने-आप को शारीरिक और मानसिक तौर पर ब्रह्मचारी बनाने का अपना प्रण पूर्ण किया।

गणित उनका भी पसंदीदा विषय था। हाज़िरजवाबी उन्हें विरासत में मिली थी। फिर भी वे अध्यात्म की ओर बराबर खिंचे जाते थे। बचपन से ही धार्मिक ग्रंथों में रुचि होने के कारण ब्रह्म को जानने की उत्सुकता उनमें गहराती जा रही थी। जब सन १९१६ में वे अपनी इंटर की परीक्षा देने मुंबई जा रहे थे तो ईश्वर में अटूट श्रद्धा उन्हें काशी ले गई। वहीं उन्होंने ‘अथातोब्रह्मजिज्ञासा' का अध्ययन किया। वे सन्यास लेकर हिमालय जाना चाहते थे। साथ ही बंगाल के वीरों से मिलना भी उनका स्वप्न था। परंतु उन्हीं दिनों समाचार पत्रों में गांधी जी द्वारा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण ने उनका जीवन ही बदलक र रख दिया। उन्होंने तुरंत गांधीजी को पत्र लिखा और उनसे मिलने की इच्छा दर्शाई।

अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ वे गाँधी जी से मिलने अहमदाबाद में स्थित कोचरब आश्रम चल दिए। जब वे पहली बार गांधी जी से मिले तो उन्हें गांधीजी में वही शांति की झलक मिली जिसके लिए वे हिमालय जाना चाहते थे। साथ ही बंगाल के वीरों जैसी हिम्मत भी उन्हें गाँधी जी की आँखों में दिखाई दी। वे गांधी जी से अभिभूत हो उनके पास ही रुक गए। गांधीजी ने ही विनायक को 'विनोबा' की उपाधि दी। वे आगे चलकर महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी कहलाये।


विनोबा स्वयं चितपावन ब्राह्मण थे परंतु उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष पिछड़ी जनजाति के उत्थान में व्यतीत किए। अध्ययन, अध्यापन, स्वछता, जीवन मूल्यों में सुधार और खादी को ही उन्होंने अपना जीवन बना लिया। ८ अप्रैल सन १९२१ में गांधी जी ने विनोबा को महाराष्ट्र के एक गांव वर्धा में बसे अपने आश्रम का संचालन सौंप दिया। वहीं रहकर विनोबा ने 'महाराष्ट्र धर्म' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। वे स्वयं तो इस पत्रिका में लेख लिखते ही थे साथ ही उन्होंने संत तुकाराम द्वारा रचित अभंग पर भी मुखरता से लेख लिखे जो बहुत प्रसिद्ध हुए।

कुछ वर्षों पश्चात वे नलवाड़ी गांव पहुँचे और स्वयं का भरणपोषण मात्र सूत कातकर किया। उनका मानना था कि “जब तक मैं स्वयं सूत कातकर अपने लिए वस्त्र बनाना नहीं सीखता तब तक दूसरों को उपदेश देना व्यर्थ है।”

गांधी जी के संपर्क में आने के बाद विनोबा ने उनकी नीतियों को पूर्णरूपेण अपना लिया। १९२३ में वे पहली बार जेल गए। उन्हें ४ माह के लिए नागदा जेल व अकोला जेल में रखा गया। जेल से बाहर आने के बाद गांधीजी ने उन्हें केरल के विकोम आश्रम भेज दिया। वहाँ रह रहे हरिजनों को मंदिर में प्रवेश वर्जित था। उन्हें वहाँ के ब्राह्मणों से समान अधिकार दिलवाने और अमीरी-गरीबी का फर्क मिटाना उनका प्रमुख उद्देश्य था। गांधी जी के अनुयाई विनोबा ने संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए वहाँ रह रहे पिछड़े वर्ग को शिक्षित किया। उन्हें उनके अधिकार दिलवाए।

आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करने पर उन्हें १९३२ में ६ माह के लिए धुलिया जेल जाना पड़ा। गांधी जी ने उनकी निस्वार्थ सेवा भावना को देखते हुए उन्हें ‘प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही’ की उपाधि दी। इस बीच विनोबा कई बार जेल गए। बाद में वे सन १९३९ में पवनार आश्रम चले गए और उसे ही उन्होंने अपने कार्य के लिए केन्दीय स्थान बनाया।

५ अक्टूबर सन १९४० में गांधीजी ने एक वक्तव्य में कहा "विनोबा मानते हैं कि देश को असली आजादी तभी मिलेगी जब हमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी। उनका यह भी मानना है कि खादी के प्रचार-प्रसार के बिना गांव की स्वतंत्रता संभव नहीं है।" गांधीजी के इस वक्तव्य के बाद विनोबा भावे को एक राष्ट्रीय पहचान मिली।

अंग्रेजों के साथ सत्याग्रह आंदोलन छेड़ने और स्वदेशी अपनाने का पुरजोर समर्थन करने के कारण उन्हें पुनः कारावास दिया गया परंतु उन्होंने इस समय को व्यर्थ न जाने देने का निर्णय कर लिया। जेल में बिताया समय उनके अध्ययन और लेखन के लिए महत्वपूर्ण बन गया। उन्होंने जेल में रहकर कई भाषाएं सीखीं। वहीं उन्होंने अपनी पुस्तक 'गीताई' लिखी। जेल में भी अपने साथी कैदियों को वे गीता के उपदेश सुनाया करते थे जिन्हें बाद में 'साने गुरुजी' ने गीता प्रवचन के नाम से प्रकाशित करवाया।

विनोबा ने स्वयं कई पुस्तकें लिखीं जिनमें से स्वराज्य शास्त्र, मुक्ति से मोक्ष तक, स्टड़फास्ट विस्डम आदि बहुत प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने कई बोध कथाएँ भी लिखीं उनके लेखन से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा। उन्होंने धर्म, दर्शन, शास्त्र, शिक्षा सभी पर अपने विचारों को लिपिबद्ध किया। जेल में रहकर उन्होंने लगभग १५ भाषाओं का अध्ययन किया जिनमें दक्षिण की क्षेत्रीय भाषाओं के साथ कुछ विदेशी भाषाएं जैसे अंग्रेजी, फ्रेंच, अरेबिक प्रमुख थीं। विभिन्न भाषाओं का ज्ञान ही उन्हें साधारण जनमानस से आत्मीयता बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ।

स्वतंत्रता मिलने के बाद वर्धा सेवाग्राम आश्रम में जब पंडित जवाहरलाल नेहरु और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद विनोबा से मिलने गए तब विनोबा ने 'सर्वोदय समाज' का अपना विचार दोनों के सामने रखा परंतु वे इस पर उस समय कार्य नहीं कर पाए क्योंकि उससे अधिक महत्वपूर्ण कार्य उनकी आँखों के सामने घूम रहा था। देश के विभाजन की विभीषिका वहन करते देशवासियों के दुख दूर करना ही उस समय विनोबा के लिए अधिक महत्वपूर्ण था।

सन १९५० में विनोबा ने ‘रिषि-कृषि’ और ‘कंचन मुक्ति’ नामक २ आंदोलन एक साथ शुरू किए। इसी बीच तेलंगाना के एक गांव पोचमपल्ली में हुए संघर्ष को शांति से समाप्त करने हेतु विनोबा ने तेलंगाना की ओर कूच किया। लोगों से मिलने पर उन्होंने जाना कि वहाँ पर लोगों के पास रहने या खेती करने के लिए जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं है और यहाँ से ही विनोबा के जीवन में एक और महत्वपूर्ण पन्ना जुड़ गया।

उन्होंने सर्वप्रथम स्वयं के पास की भूमि दान की और 'भूदान आंदोलन' की नींव रखी। उन्होंने आस-पास के गावों में घूमकर लोगों से उनकी भूमि का छठवां हिस्सा दान करने के लिए विनती की। इस आंदोलन हेतु पूरे देश में पैदल यात्रा कर अंततोगत्वा विनोबा ने लाखों एकड़ जमीन एकत्रित कर ली जिसमें से २३ लाख एकड़ ज़मीन मात्र बिहार से प्राप्त हुई थी।

विनोबा अक्सर कहा करते थे, "जनता ही भगवान है इसलिए गरीबों की मदद करना हमारा परम कर्तव्य है"। मानवता की शक्ति में उनकी असीम श्रद्धा थी। उन्होंने जनता के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं बनाईं और उनका सफल क्रियान्वयन किया। इन योजनाओं में भूदान, संपत्ति दान, श्रमदान, सर्वोदय पात्र प्रमुख थे।


हमारी संस्कृति में १४ वर्षों का विशेष महत्व है। इस धरती पर जन्मे पुत्र, चाहे वह राम हो या पांडव, १४ वर्ष वन-वन पदाति घूमे हैं। उन्हीं के पदचिन्हों पर चलते हुए विनोबा ने अपने जीवन के १४ वर्ष पूरे भारत में पदयात्रा करते हुए, जनमानस के साथ संपर्क बनाने और उनके उत्थान में व्यतीत किए। इसी दौरान सन १९६८ में वे चम्बल घाटी पहुँचे, जो डाकुओं का बीहड़ माना जाना था। वहाँ पहुँच वे कई कुख्यात डाकुओं का ह्रदय परिवर्तन करने में सफल रहे। उन डाकुओं ने उनके समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए नए जीवन की शुरुआत करने की कसम खाई।

उम्र बढ़ती गई परन्तु हौंसले कम न हुए। फिर भी साथियों की बात मानकर अब 'पदयात्रा' का स्थान 'तूफान यात्रा' ने ले लिया जिसमें जनमानस तक पहुँचने के लिए तेज गति से चलने वाले वाहनों का इस्तेमाल किया गया। पूरा देश घूमने और जन-जन को एक सूत्र में बाँधने के बाद सन १९७० में वे पवनार आश्रम वापस लौट आए और मौन व्रत धारण कर लिया। वहीं रहकर उन्होंने गौहत्या के विरोध में भूख हड़ताल की परंतु समय ने उनपर अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी थी। वे धीरे-धीरे ब्रह्म में लीन होने लगे। उनकी आध्यात्मिक शक्ति बलवती होती गई और महाप्रयाण की तैयारी हेतु उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया।

१५ नंबर सन १९८२ में ८८ वर्ष की आयु में एक वीर आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई।


ॐ शांति


अगला लेख: मेरा उपन्यास अश्वत्थामा यातना का अमरत्व



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x