मासूम बचपन और हैवानियत का दंश

21 अगस्त 2018   |  हरीश भट्ट   (75 बार पढ़ा जा चुका है)

मासूम बचपन और हैवानियत का दंश

मासूमों पर वहशियों की नजर क्या पडी. बचपन बर्बाद हो गया. इंसानियत शर्मसार हुई तो संस्कारों पर भी सवाल खड़े हो गए. बाल उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़े यह सोचने पर बाध्य करते हैं कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति में कहां चूक हो गई कि भगवान स्वरूप बच्चे ही हैवानों का शिकार होने लगे. कभी अपनों की तो कभी गैरों की हवस की संतुष्टि का शिकार बनते हैं ये बच्चे आखिर कहां जाएंगे. एक ओर सरकार कहती है कि बेटियां बचाओ बेटियां पढ़ाओ दूसरी ओर बेटियों की अस्मत को बचाने के लिए कठोरतम कानून को लागू करवाने में हीलाहवाली करती है अगर आसानी से चीजों को मान जाता तो अब तक न जाने कितने असमय मौत का शिकार होने से बच जाते. बहुत छोटी सी बात है कि बाइक सवाल हेलमेट अपनी जान बचाने के लिए नहीं, पुलिस के चालान से बचने के लिए पहनते हैं. तब ऐसे में जागरूकता अभियानों की सार्थकता पर सवाल खड़ा होना लाजमी है. बिना सजा के कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है. तब ऐसे में कैसे माना जा सकता है कि हम सिर्फ अवेयरनेस कार्यक्रम चलाकर मासूमों को हैवानों का शिकार होने से बचा सकते हैं. इस समय कठोरतम कानून को लागू करवाने के लिए पारदर्शी एजेंसियों की आवश्यकता है जितनी जल्दी यह काम होगा इतनी जल्दी ही मासूमों के प्रति बढ़ते जघन्य अपराधों को रोका जा सकता है. सच मानिए मौत के आगे भूत भी नाचते हैं तब इंसान की क्या औकात. लेकिन वह जानता है कि कोई अपराध हो भी गया तो क्या कई दिन कई महीने कई साल तक फ्री में खाना-रहना मिल ही जाएगा भले ही सलाखों के पीछे ही सही.

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