प्रणाम का महत्त्व :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

21 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (130 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रणाम का महत्त्व :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारी भारतीय संस्कृति सदैव से ग्राह्य रही है | हमारे यहाँ आदिकाल से ही प्रणाम एवं अभिवादन की परम्परा का वर्णन हमारे शास्त्रों में सर्वत्र मिलता है | कोई भी मनुष्य जब प्रणाम के भाव से अपने बड़ों के समक्ष जाता है तो वह प्रणीत हो जाता है | प्रणीत का अर्थ है :- विनीत होना , नम्र होना या किसी वरिष्ठ के समक्ष शीश झुकाना आदि | प्रणाम करने की विधि भी हमारे शास्त्रों में बताई गयी है | दोनों हाथ जोड़कर वक्षस्थल से लगाकर ही बड़ों को प्रणाम करना चाहिए , प्रणाम करते समय दोनों हाथ की अंजलि वक्षस्थल से जुड़ी होनी चाहिए ऐसा करने का भाव यह होता है कि :- हृदय को साक्षी मानकर , हृदय से प्रतीकस्वरूप सम्पूर्ण अस्तित्व सम्मानीय के समक्ष नतमस्तक हो रहा है | इसके अतिरिक्त प्राचीनकाल की गुरुकुल परम्परा में गुरु जी के सामने लेटकर "साष्टांग प्रणाम" करने का विधान था जिसका तात्पर्य यह था कि गुरु जी चरणों के अंगूठे से प्रवाहित ऊर्जा का स्वयं में उत्सर्जन करना | जब प्रणाम किया जाता है तो उसके बदले में आशीर्वाद की भी प्राप्ति होती है | परंतु किसी के भी आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए प्रणाम करना आवश्यक है | जब किसी को प्रणाम किया जाता है तो स्वत: ही उसके मुख से आपके लिए आशीर्वाद निकल ही पड़ता है | हमारे मनीषियों ने बताया है कि :-- " अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन: ! चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम् !! अर्थात :- जो व्यक्ति अपने से बड़ों का अभिवादन करके नित्य प्रणाम करता है उस व्यक्ति की चार चीजें वृद्धि को प्राप्त होती रहती हैं - आयु , विद्या , यश एवं बल | आशीर्वाद के चार अक्षर प्रतीक रूप में आयु , विद्या , यश एवं बल का ही स्वरूप हैं | जिस शुभकामना से लोगों की इन चार चीजों में वृद्धि हो वही आशीर्वाद है |* *आज के यांत्रिक युग में प्रणाम एवं आशीर्वाद जहाँ अपना महत्त्व खोते जा रहे हैं वहीं इनकी प्रासंगिकता भी समाप्त हो रही है | आज ज्यादातर "लट्ठमार प्रणाम" ही होता है | तो उसके परिणामस्वरूप आशीर्वाद भी वैसा ही मिल रहा है | कुछ लोग तो शिकायत भी करते हैं कि भगवान को , महापुरुषों को , बड़ों प्रणाम भी करने पर कोई फल नहीं मिल रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" ऐसे लोगों को बताना चाहूँगा कि :-- जिन लोगों को बार - बार आशीर्वाद मिलने के बाद भी कोई लाभ नहीं मिलता उसका अर्थ यह है कि न तो श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया गया और न ही आशीर्वाद लिया गया | आशीर्वाद जीवन में तभी उतर सकेगा जब व्यक्ति में आशीर्वीद के प्रभाव को ग्रहण करने की क्षमता होगी | यदि व्यक्ति में ग्रहणशीलता नहीं है तो उसे कुछ भी नहीं दिया जा सकता | उसी प्रकार यदि आशीर्वाद प्राप्त करने वाले व्यक्ति के अंदर अहंकार का भाव हो , विनम्रता न हो तो वह व्यक्ति आशीर्वाद का लाभ कदापि नहीं ले सकता | प्रणाम की परम्परा रखने के पीछे हमारे मनीषियों का यही मंतव्य रहा होगा कि व्यक्ति पिरणाम के ही बहाने सही परंतु विनम्र बनता रहे , अहंकार का भाव समाप्त होता रहे और मनुष्य पतुत होने से बचता रहे |* *प्रणाम करने का भाव मनुष्य को निरहंकारी बनाता है | अत: प्रत्येक मनुष्य को अपने व्यक्तित्व में निरहंकारिता का विकास करते हुए नित्य प्रणाम करने की आदत डालने का प्रयास करना चाहिए |*

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