सुख एवं दुख :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (69 बार पढ़ा जा चुका है)

सुख एवं दुख :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में जब से मानवी सृष्टि हुई तब से लेकर आज तक मनुष्य के साथ सुख एवं दुख जुड़े हुए हैं | समय समय पर इस विषय पर चर्चायें भी होती रही हैं कि सुखी कौन ? और दुखी कौन है ?? इस पर अनेक विद्वानों ने अपने मत दिये हैं | लोककवि घाघ (भड्डरी) ने भी अपने अनुभव के आधार पर इस विषय पर लिखा :- "बिन व्याही बिटिया मरै , ठाढै ऊँख बिकाय ! बिन मारे वैरी मरै , ई सुख कहाँ अमाय !!" अर्थात :- कुँवारी पुत्री का निधन हो जाय , खेत से ही गन्ना बिक जाय और बिना युद्ध किये शत्रु मर जाय तो यह संसार के सबसे बड़े सुख हैं ! वहीं दुख की व्याख्या करते हुए भड्डरी जी कहते हैं :- नसकट पनही बतकट जोय ! जौ पहिलौटी बिटिया होय !! पातर कृषी बौरहा भाय ! "घाघ कहैं दुख कहाँ अमाय !! अर्थात :- जूता जब पैर काटने लगे , पत्नी बात काटने लगे पहली संतान के रूप में पुत्री हो जाय , खेती ढंग की न हो और भाई अर्द्धपागल हो तो यह दुनिया का सबसे बड़ा दुख है | परंतु क्या इन लोकोत्तियों से सुख - दुख का आंकलन किया जा सकता है ? इन कहावतों को सुनकर यही कहा जा सकता है कि यह घाघ जी का अनुभव है जो उनको समाज में दिखा वह लिख दिया | परंतु इन अनुभव से अलग हटकर हमारे आध्यात्मिक गुरुओं ने सुखी मनुष्य की व्याख्या करते हुए लिखा है कि :- "अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः ! सदा सन्तुष्टमनसः सर्वाः सुखमयाः दिशः !! अर्थात :-अकिञ्चन, संयमी, शांत, प्रसन्न चित्तवाले, और संतोषी मनुष्य को सब दिशाएँ सुखमय है | यदि उपरोक्त तथ्य को माना जाय तो विचार किया जा सकता है कि आखिर दु:खी कौन है ??* *आज समाज में कोई भी सुखी नहीं दिखाई पड़ता है | मानव मात्र को कुछ न कुछ दुख अवश्य घेरे रहता है | मनुष्य के दुख का कारण जहाँ एक ओर उसके अन्त:करण में व्याप्त हो चुकी ईर्ष्या - द्वेष की भावना प्रमुख है वहीं मनुष्य का संसार के प्रति मोह ही मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है :- "मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला !" मनुष्य को सुख एवं दुख कभी भी किसी दूसरे के कारण नहीं मिलता बल्कि उसके द्रारा किये गये कर्म ही उसके सुख एवं दुख का कारण बन जाते हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह बात कह सकता हूँ कि :- आज न तो कोई अकिञ्चन है और न ही किसी का भी चित्त ही शान्त है , और जब तक चित्त शान्त नहीं होगा तब तक न तो प्रसन्नता हो सकती है और न ही मनुष्य को संतोष प्राप्त हो सकता है | और जब तक मनुष्य को संतोष नहीं होगा तब तक उसे सुख की अनुभूति नहीं हो सकती | इसीलिए कहा गया है :- "संतोषम् परमं सुखम्" परंतु आज किसी को भी संतोष है ही नहीं और यही मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण है | इस विषय पर अनेकों पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं परंतु यह ऐसा विषय है कि इस पर चर्चा अनवरत होती ही रहेगी |* *सुख और दुख अपने हृदय में उठ रहे विचारों एवं उनके क्रियान्वयन के अनुसार मनुष्य को प्राप्त होते रहते हैं | इस पर गहनता से विचार करने की परम आवश्यकता है |*

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