कल की रात

23 अगस्त 2018   |  आयेशा मेहता   (98 बार पढ़ा जा चुका है)

कल की रात  - शब्द (shabd.in)

कल की रात ,बिना पलक झपके ,

एक ही लय में , एक ही सुर में ,

टकटकी लगाए मैं चाँद को देख रही थी ा

आँखों में न तो उदासी था ,

और न ही पानी ,

बस .. दिल में दर्द का एक डुबान था ा

ऐसा लग रहा था ,

मानो दूर समुंदर में ,

एक तूफान आने वाला है ,

जो अक्सर ख़ामोशी के बाद आता है ा

एक धुआँ आसमान में था ,

हौले -हौले उसमें चाँद छिप रहा था ,

और एक धुआँ मेरे अंदर उठ रहा था ,

जज्जबातों का ,काँपते हुए दर्द का ,

शायद कोई अधूरा ख्वाहिश ,

मद्धम -मद्धम जलकर राख हो रहा था ा

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रेणु
28 अगस्त 2018

बहुत ही हृदय स्पर्शी कथा काव्य प्रिय आयशा ।एक सजीव चित्र उभरा है रचना में ।स्नेह के साथ

अलोक सिन्हा
24 अगस्त 2018

बहुत अच्छी रचना है | बहुत मन से और भावनाओं में डूब कर लिखी हुई |

आयेशा मेहता
24 अगस्त 2018

धन्यवाद प्रिय अलोक जी यदि इसी तरह आपका आशीर्वाद मेरे साथ रहा तो शायद इससे भी बेहतर लिख पाऊँगी ा

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