"चिन्तन"

27 अगस्त 2018   |  इंजी. बैरवा   (41 बार पढ़ा जा चुका है)

"चिन्तन" - शब्द (shabd.in)

एक बेटी इतनी बड़ी हो सकती है की वह आपकी गोद में ना समाये, पर वह इतनी बड़ी कभी नहीं होती की आपके दिल में ना समा सके । एक बेटी, अतीत की खुशनुमा यादें होती है, वर्तमान पलों का आनंद और भविष्य की आशा और उम्मीद होती है अज्ञात

एक बेटी को जन्म देने से, अचानक एक औरत की गोद में केवल एक मासूम ही नहीं बल्कि एक छोटी लड़की, आने वाले कल की औरत और उसके अपने अतीत के द्वन्द और भविष्य के सपने और उम्मीदें भी आ जाती हैं अज्ञात




रक्षा बंधन के अवसर पर चिंतन " गर्भ हत्या और बलात्कार :-

बलात्कार और गर्भ में हत्या की संस्कृति की जड़े कहां हैं ???

एक संवेदनशील इंसान के रूप में यह कल्पना करना भी किसी के लिए मुश्किल हो सकता है कि भारत में 94 प्रतिशत बलात्कारी अपने कहे जाने वाले लोग हैं, और 6 करोड़ 30 लाख लड़कियों को गर्भ में पहचान करा करके कि वे लड़किया हैं, उनके माता-पिता ने उन्हें मार डाला या 2 करोड़ 10 लाख ऐसी लड़कियों ने जन्म लिया, जिन्हें उनके माता-पिता जन्म नहीं देना चाहते थे ।

भारत में प्रत्येक दिन 106 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती है। सबसे दुखद और शर्मनाक यह है कि 94 प्रतिशत बलात्कारी सगे सम्बन्धियों- पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, फूफा, जीजा, ममेरे, फुफेरे, चचेरे भाई, अन्य रिश्तेदार, पारिवारिक दोस्त तथा पड़ोसी हैं । बलात्कार की शिकार 94 प्रतिशत स्त्रियां 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां होती हैं । क्या बलात्कार संबंधी इन तथ्यों का इस तथ्य से कोई रिश्ता है कि 6 करोड़ 30 लाख लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई और 2 करोड़ 10 लाख ऐसी लड़कियों ने जन्म लिया, जिन्हें जन्म देना उनके माता-पिता नहीं चाहते थे ।

बलात्कार संबंधी कुछ अन्य तथ्य-

  1. भारत में प्रत्येक दिन लगभग 106 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती है । सिर्फ राजधानी दिल्ली में ही प्रतिदिन 6 लड़कियां बलात्कार का शिकार होती हैं ।
  2. बलात्कार की शिकार महिलाओं में 94 प्रतिशत, 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां हैं । दुधमुँही मासूम बच्ची से लेकर 70 साल की दादी-परदादी भी बलात्कार का शिकार से अछूती नहीं हैं ।
  3. सामाजिक तबकों के आधार पर सर्वाधिक बलात्कार की शिकार आदिवासी, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलायें होती हैं । औसतन प्रत्येक दिन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है ।
  4. शिक्षण संस्थान, फैक्टरी, ऑफिस, अस्पताल जैसी जगहों से भी आये दिन बलात्कार की खबरें आती हैं । पूजा स्थल भी बलात्कार के मुख्य अड्डों में से एक हैं। पहले से ही यहां देवदासी के रूप में बलात्कार को परंपरागत रूप में स्वीकृत रहा है ।

अगर बलात्कारियों के अलग-अलग समूहों की सूची बनाई जाये तो बलात्कारियों के निम्न समूह सामने आते हैं

  • 94 प्रतिशत बलात्कारी सगे सम्बन्धियों- पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, फूफा, जीजा, ममेरे, फुफेरे, चचेरे भाई, अन्य रिश्तेदार, पारिवारिक दोस्त तथा पड़ोसी हैं ।
  • बलात्कारियों की सूची में दूसरा सबसे बड़ा समुदाय पुलिस, सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों का शामिल है ।

वर्तमान समय के 3 सांसदों और 48 विधायकों ने चुनाव पूर्व की अपनी घोषणा में यह स्वीकार किया है कि उनके ऊपर महिलाओं के खिलाफ हिंसा का आरोप हैं । इसमें बलात्कार का आरोप भी शामिल है ।

  • हमारे समाज में पुरुष प्रायः अपनी पत्नियों के साथ उनकी अनिच्छा के बावज़ूद, और कभी-कभी तो विरोध के बावज़ूद शारारिक सम्बन्ध बनाते हैं जो कि सारतः बलात्कार ही है ।

बलात्कारियों का अन्य समुदाय जाति-धर्म के आधार पर बनता है । भारत में दलित स्त्रियों के साथ गैर दलितों द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटनायें आये दिन अंजाम दी जाती हैं । प्रत्येक दिन औसतन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है ।

  • सामूहिक बलात्कार का दूसरा शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है । गुजरात दंगे के दौरान खुलेआम सड़क पर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार तथा पेट फाड़ने की घटना ने सबको शर्मशार कर दिया था । यह अपवादस्वरूप घटने वाली घटना नहीं, यह हर साम्प्रदायिक दंगे की सच्चाई है ।
  • हिन्दुवादियों का स्त्री-विरोधी होने का घिनौना चेहरा मुजफ्फरनगर दंगो में सामने आया जब गाँव के ही लोग जिन्हें कल तक मुस्लिम स्त्रियाँ अपना चाचा, ताऊ, भाई, बेटा कहकर पुकारती थीं, उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने में इन ताऊओं, चाचाओं, बेटों, भाईयों को कोई शर्म नहीं आयी । शर्म की जगह गर्व की अनुभूति हुई । वे आज भी गर्व से फूले घूम रहे हैं, कई तो सांसद भी बन गये ।
  • असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मजदूर महिलाओं को आये दिन यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है लेकिन अधिकतर इस प्रकार के मामलों की कोई सुनवाई तक नहीं होती है ।

देश के पूर्वोत्तर राज्यों तथा कश्मीर की महिलाओं के साथ भारतीय पुलिस, अर्द्धसैनिक बल तथा सेना द्वारा आये दिन महिलाओं की मर्यादा का उल्लंघन के किस्से प्रकाशित होते रहते है ।

  • नक्सल विरोधी–माओवादी विरोधी युद्ध के नाम पर पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों के लोग आये दिन आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार तथा यौन हिंसा करते रहते हैं । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अर्ध सैनिक बलों द्वारा बस्तर में बलात्कार की घटनाओं की पुष्टि भी की है ।

इस प्रकार हम देखते हैं कि घर या बाहर कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ किसी भी उम्र की औरत अपने आपको पूर्णतः सुरक्षित महसूस कर सके और न ही पुरुषों का कोई ऐसा समुदाय है, जिससे स्त्री अपने को हिंसा की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित समझे; फिर किसकी-किससे, कहाँ-कहाँ पुलिस, कानून से रक्षा की जा सकती है तथा किसको-किसको फाँसी दी जाये । कानून और दंड, चंद अपराधियों के लिए होते हैं, जब समाज का बहुलांश हिस्सा ही स्त्री समुदाय के प्रति दोगली मानसिकता रखता हो, तब क्या किया जाए ?

अब समय है कि हम स्त्री- धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को समझते हुए उसकी रक्षा करें ।

बुढ़ापे में रोटी

आप की औलाद नही

आपके दिए गए

संस्कार खिलाएंगे

खुद की समझदारी ही अहमियत रखती है

वरना अर्जुन और दुर्योधन के गुरु तो एक ही थे !!!


( स्रोत- बलात्कार संबंधी आंकड़े नेशनल क्राइम ब्यूरों की रिपोर्ट पर आधारित हैं । 6 करोड़ 30 लड़कियों की गर्भ में हत्या और 2 करोड़ 10 लाख अनचाही लड़कियों के जन्म लेने का आंकड़ा भारतीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 2017-18 के अपने आर्थिक सर्वे में प्रस्तुत किया था ।

एक सूचना- बलात्कार की घटनाओं के विविध पहलुओं पर समयांतर ( पंकज विष्ठ ) पत्रिका ने मई अंक में कई लेख प्रकाशित किए हैं, जिन्हें संभव हो तो जरूर पढ़ना चाहिए । )

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अलोक सिन्हा
12 सितम्बर 2018

बहुत अच्छा लेख है |

शोभा भारद्वाज
12 सितम्बर 2018

मेरी बेटी हम पति पत्नी की जान है वह ऐसी ऊचाईयों पर पहुँची है हमे गर्व है वह हमारी बच्ची है

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