रक्षाबंधन :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

27 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

रक्षाबंधन :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन संस्कृति इतनी मनोहारी है कि समय समय पर आपसी प्रेम सौहार्द्र को बढाने वाले त्यौहार ही इसकी विशिष्टता रही है | शायद ही कोई ऐसा महीना हो जिसमें कि कोई त्यौहार न हो , इन त्यौहारों के माध्यम से समाज , देश एवं परिवार के बिछड़े तथा अपनों से दूर रह रहे कुटुंबियों को एक दूसरे से मिलने का अवसर मिलता है | इन्हीं त्यौंहारों की श्रृंखला में आज का त्यौहार विशिष्ट है क्योंकि यह स्नेह के बंधन का पर्व है | "रक्षाबंधन" का पर्व प्रेम के साथ स्नेहबंधन व रक्षा के संकल्प का भाव लेकर आता है | यह त्यौहार राखी अर्थात "रक्षासूत्र" के बिना पूरा नहीं होता | प्राचीनकाल में जब भगवान वामन ने राजा बलि को पाताल जाने को कहा तब राजा बलि ने भगवान से इच्छा प्रकट की कि आप भी हमारे साथ वाताल चलें | भगवान उनके स्नेहबंधन में बंधकर पाताल चले गये | लक्ष्मी जी को जब इस बात का पता चला तो श्रावण शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को रक्षासूत्र लेकर राजा बलि के यहाँ पहुँच गयीं | जब राजा बलि हाथ में लक्ष्मी जी ने वह राखी बाँधी तो दानवेन्द्र बलि ने रक्षा करने का वचन तो दिया ही साथ ही कुछ भी माँग लेने कहा | लक्ष्मी जी ने वामन भगवान को मांग लिया | तभी से राखी का त्यौहार मवाया जाने लगा और रक्षासूत्र बांधते समय मंत्र कहा जाने लगा :-- "येनबद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: ! येनत्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल माचल !!" अर्थात :-जिस रक्षासूत्र से राजा बलि को बांधा गया था उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें भी बांधता हूँ/ बाँधती हूँ ! हे रक्षे ! तुम स्थिर रहना ! स्थिर रहना !! इस स्नेह बंधन को लेकर और भी कई कहानियां प्रचलित हैं , जहाँ बहनों ने नि:स्वार्थ भाव से भाईयों को राखी बाँधी और बदले में भाईयों ने आजीवन बहन की रक्षा करने का वचन भी दिया है | जिसका उदाहरण महाभारत में कृष्ण और द्रौपदी के रूप में भी देखने को मिलता है |* *आज अनेक त्यौहारों के साथ यह स्नेह का पर्व भी अपनी प्रासंगिकता खोता चला जा रहा है | आज यह पर्व भी अधिकतर दिखावा मात्र ही बनकर रह गया है | न भाईयों में बहनों की रक्षा करने वाली प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है और न ही बहनों में ही वह प्रेम उपज रहा है | आज तो यदि भाई धनाढ्य है तो बहनें अधिक पाने की लालसा में चाँदी की राखियाँ लेकर पहुँच जाती हैं परंतु दुर्भाग्यवश यदि भाई निर्धन और बहन धनाढ्य हो गयी तो वह स्वयं न जाकर राखी भिजवा देती है | ऐसा देखकर यह प्रतीत होता है कि आज आपसी सामंजस्य एवं भाई - बहन के प्यार में भी कमी आ रही है | सभी लोग अपनी गृहस्थी में इतने ज्यादा व्यस्त एवं मस्त हो गये हैं कि एक दिन प्रेम बाँटने के लिए भी समय नहीं बचा है | जबकि मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि राखी मात्र भाई - बहन का त्यौहार न होकर एक संकल्पना का पर्व है | रक्षाबंधन में प्रयुक्त बंधन शब्द किसी संकल्प से बंधे होने का सूचक है , परंतु यह बंधन स्वयं में सकारात्मक भाव लिए हुए होता है | अच्छे प्रयोजन के लिए बंधना या किसी को बाँधना निजी स्वतंत्रता का सूचक है | बहन जब अपने भाई को रक्षासूत्र बांधती है तो भाई उसे अभय प्रदान करता है यही अभय प्राप्त करके बहन स्वतंत्रता का अनुभव करती है | हमारे देश के सैनिक भी देश की रक्षा के बंधन में बंधकर देश को अभय प्रदान करते हैं |* *रक्षाबंधन हमें स्वतंत्रता देता है कि हम इस दायित्व के बोध के योग्य बनें ताकि हम अपने पराक्रम , प्रतिभा के द्वारा दूसरे की रक्षा कर सकें |*

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