कैसे हो भगवान का दर्शन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

29 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (51 बार पढ़ा जा चुका है)

कैसे हो भगवान का दर्शन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन काल से मनुष्य धर्मग्रंथों का निर्देश मान करके ईश्वर को प्राप्त करने का उद्योग करता रहा है | भिन्न - भिन्न मार्गों से भगवत्प्राप्ति का यतन किया जाता रहा है | इन्हीं में एक यत्न है माला द्वारा मंत्रजप | कुछ लोग यह पूंछते रहते हैं कि धर्मग्रंथों में दिये गये निर्देशानुसार यदि निश्चित संख्या में जप कर लिया जाय तो क्या भगवान प्रकट हो सकते हैं ?? तो मेरा कहना यही होगा कि हाँ , परंतु माला जपने के पहले यह जान लेना आवश्यक है कि माला क्या है ?? माला जपने के पहले मनुष्य को अपने हृदय के विकारों का शमन करना पड़ेगा | माला तो मान लीजिए कि एक रस्सी मात्र है जिससे घोड़े को बाँधा जाता है | घोड़ा अलग है और रस्सी अलग | यदि हमें घोड़े को बाँधना है तो रस्सी की आवश्यकता पड़ेगी , क्योंकि बिना रस्सी के घोड़ा नहीं बाँधा जा सकता | हम जब घोड़े की रस्सी पकड़ते हैं तो कहा करते हैं कि हमने घोड़ा पकड़ रखा है | क्या यह सही है ?? जी नहीं हमने घोड़े को पकड़ने का माध्यम मात्र पकड़ रखा है | उसी प्रकार माला माध्यम है , मनुष्य ने माला पकड़ी है न कि भगवान को | माला से भगवान को पकड़ा जा सकता है परंतु माला को ही भगवान कह देना उचित नहीं प्रतीत होता | हाँ मंत्र जप करने से परिणाम सुखद हो सकते हैं | क्योंकि समयानुसार नित्य नियमित रूप से मंत्र जप करने से शरीर एवं मन के बीच एक लयात्मकता उत्पन्न होती है और दोनों (शरीर एवं मन) के अंदर विद्यमान विषाक्तता , कषाय एवं कल्मषता दूर होती है और यही दूर करके भगवान को पाया जा सकता है |* *आज के शोरगुल युक्त वातावरण में सबसे कठिन है मन को एकाग्र करना | मन को एकाग्र करने का सबसे सरल साधन है मंत्रजप | परंतु आज मंत्र का जप करते समय भी मन चलायमान ही रहा करता है | आज यह दुर्भाग्य है कि यत्र तत्र भगवान का दर्शन कराने की दुकानें सी लग गयी हैं | मंहगे - मंहगे उपाय बताये जाते हैं करने के लिए जिससे कि भगवान के दर्शन होने का दावा किया जाता है | बहुत लोगों गृहस्थ धर्म का त्याग करके संयास तक ले लिया परंतु उनको भगवान की छाया तक नहीं दिखी | इसका क्या कारण हो सकता है ?? मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का विचार है कि मनुष्य ने अनेकानेक साधन तो अपना लिये परंतु जो पहले से अपनाये हुए है (काम क्रोध मद लोभ अहंकार आदि ) उसका त्याग नहीं कर पा रहा है | और जब तक इनका त्याग नहीं किया जायेगा तब तक भगवान के दर्शन तो क्या उनकी कृपा भी नहीं प्राप्त हो सकती | आज मैं देख रहा हूँ कि लोग अनुष्ठान करवाते हैं , धन खर्च करते हैं , विद्वानों की टोली उनके घर पहुँचकर पूजन करवाती है परंतु उनका मन (यजमान) एकाग्र नहीं हो पाता | आज के यजमान पूजन करते रहते हैं और घर की व्यवस्थाओं के लिए घर वालों को निर्देशित भी करते रहते हैं ! तो आप स्वयं विचार करें कि फल कैसे मिलेगा | जब मन एकाग्र नहीं होगा तब तक किसी मंदिर , पूजा , अनुष्ठान एवं मंत्रजप से ईश्वर का दर्शन दिवास्वप्न के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है |* *भगवान के दर्शन या उनकी कृपा प्राप्त करनी है तो मन कल्मषता , विकार आदि को दूर करना पड़ेगा और मनुष्य वही कर नहीं पा रहा है |*

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