काम प्रवृत्ति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

29 अगस्त 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (75 बार पढ़ा जा चुका है)

काम प्रवृत्ति :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धराधाम पर मनुष्य अपने जीवनकाल में अनेक शत्रु एवं मित्र बनाता रहता है , यहाँ समय के साथ मित्र के साथ शत्रुता एवं शत्रु के साथ मित्रता होती है | परंतु मनुष्य के कुछ शत्रु उसके साथ ही पैदा होते हैं और समय के साथ युवा होते रहते हैं | इनमें मनुष्य मुख्य पाँच शत्रु है :- काम क्रोध मद लोभ एवं मोह | ये पाँच पिशाच हैं जो अपने अपने अवसर पर मनुष्यों का रक्त पीते रहते हैं और मनुष्य जान भी नहीं पाता | कभी - कभी तो जानकर भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होता है | इनमें सबसे प्रबल एवं खतरनाक है सबसे पहला "काम" रूपी शत्रु | ईश्वर की सृष्टि में जिन गुणों एवं अवगुणों का सृजन हुआ है वे व्यर्थ नहीं हैं परंतु जब उनका वेग बढता है तो वे घातक एवं दुष्परिणाम दायक होने लगते हैं | वैवाहिक जीवन की आधारशिला "काम" पर ही स्थिर है | स्त्री - पुरुष के आकर्षण को ही काम कहा गया है जिससे आकर्षित होकर दोनों का समागम होता है एवं संतानोत्पादन करके सृष्टि को गतिमान बनाये रखने में सहयोगी की भूमिका निभाते हैं | परंतु यही काम जब बढ जाता है तो मनुष्य अंधा एवं बहरा हो जाता है | उसे अपने लक्ष्य के आगे न तो कुछ सुनाई पड़ता और न ही दिखाई | कामान्धता में मनुष्य ऐसे कुकृत्य कर डालता है जो अमानवीय कहा जाता है | काम इतना प्रबल होता है कि अथर्ववेद में लिखना पड़ा :-- तत स्वत्वर्मास ज्यामान् विश्वहा महांस्तस्मैते ते काम नम इत्कृणोमि !! अर्थात :-- काम सबसे पहले पैदा हुआ इसको न देव जीत सके, न पितर और न मनुष्य जीत सके | इसलिए है काम् तू सब प्रकार से बहुत बड़ा है ! अतः मैं तुझे नमस्कार करता हूं ! काम की प्रबलता को मनुष्य आत्मसंयम एवं ब्रह्मचर्य के द्वारा यदि प्रयास करे तो जीत तो नहीं सकता परंतु नियंत्रित कर सकता है | हमारे महापुरुषों ने इस प्रबल शत्रु को नियंत्रित करके ही अपनी तपश्चर्या को आगे बढाया है | इस संसार में कोई इस कामरूपी शत्रु के वारों से बच पाया हो ऐसा कहना या लिखना शायद सम्भव नहीं है परंतु हाँ आज भी अनेक गृहस्थ हैं जो इस प्रबल शत्रु को नियंत्रित करके समाज में उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं |* *आज के परिवेश में काम क्रोध मद लोभ एवं मोह ने चारों ओर विधिवत अपना जाल फैला रखा है | आज का मनुष्य इन अवगुणों से एकदम घिरकर अपने कृत्य कर रहा है | विशेषकर युवापीढी काम रूपी प्रबल शत्रु के चंगुल में इस प्रकार फंस गयी है कि निकलने का मार्ग नहीं पा रही है | किसी भी गुण या वस्तु की अधिकता सदैव से घातक ही सिद्ध हुई है | उसी प्रकार अनियंत्रित काम से व्यभिचार व बलात्कार की सृष्टि होती है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कह सकता हूँ कि इस कामरूपी अवगुण का विस्तार करने में सहायक की भूमिका आज समाज में अश्लील साहित्य, विज्ञापन, सिनेमा व टी.वी. सीरियलों में प्रदर्शित उत्तेजक दृश्य, संवाद व संगीत और अर्धनग्न पहनावा, तामसी भोजन व मद्यपान आदि निभा रहे हैं | आज जिस प्रकार की फिल्में परोसी जा रही हैं उससे युवा मन में यह दुर्गुण तेजी से पनप रहा है | विशेषकर भोजपुरी फिल्में तो सारी हदें पार रही हैं | आज समाज में बलात्कार , व्यभिचार का सबसे बड़ कारण फिल्मों के माध्यम से युवाओं को परोसी जा रही अश्लीलता को कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी | इससे बचकर ही जीवन को सुंदर बनाया जा सकता है |* *काम पर विजय तो नहीं प्राप्त की जा सकती परंतु अच्छे साहित्यों का अध्ययन एवं सात्विक भोजन तथा स्वयं के विचारों में परिवर्तन करके इस पर नियंत्रण अवश्य किया जा सकता है |*

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