सुधारें अपनी भूल :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

03 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (89 बार पढ़ा जा चुका है)

सुधारें अपनी भूल :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संसार में मनुष्य एक अलौकिक प्राणी है | मनुष्य ने वैसे तो आदिकाल से लेकर वर्तमान तक अनेकों प्रकार के अस्त्र - शस्त्रों का आविष्कार करके अपने कार्य सम्पन्न किये हैं | परंतु मनुष्य का सबसे बड़ा अस्त्र होता है उसका विवेक एवं बुद्धि | इस अस्त्र के होने पर मनुष्य कभी परास्त नहीं हो सकता परंतु आवश्यकता होती है यह परखने की कब , कहाँ , कैसे , विवेक का प्रयोग किया जाय कि सफलता ही मिलती रहे | विवेक ईश्वर प्रदत्त है तो इसका परिमार्जन स्वयं मनुष्य के हाथ में हैं | जितना चाहे इसको चमका सकता है | बचपन से प्रखर बुद्धि का बालक यदि अपनी प्रखरता में वृद्धि करता रहता है तो वही विद्वान बनकर समाज का मार्गदर्शक बनता है | इस संसार में सभी चाहते हैं कि उनकी बुद्धि प्रखर हो , परंतु कभी - कभी प्रखर बुद्धि वाले भी यदि दूसरों के सिखाने में आ जाते हैं तो उनकी बुद्धि कुंठित हो जाती है और वे ऐसे कार्य करने लगते हैं कि समाज उनकी निंदा करने लगता है | कभी - कभी मनुष्य के द्वारा जाने - अन्जाने में ऐसे कृत़्य होने लगते हैं कि वह निंदित होने लगता है | महारानी कैकेयी अपनी प्रखर बुद्धि के लिए जानी जाती थीं परंतु मन्थरा की बातों में आकर वे भी ऐसा कृत्य कर बैठीं कि युगों का समय बीत जाने के बाद आज भी कोई अपनी कन्या का नाम कैकेयी नहीं रखता है | परंतु कैकेयी भी आत्मग्लानि एवं पश्चाताप की अग्नि में जलीं एवं चित्रकूट में श्री राम से क्षमाप्रार्थी भी हुईं तब उनके हृदय का बोझ कुछ कम हुआ | इससे यह सिद्ध हो जाता है कि कैकेयी जी उस समय पर अपने विवेक का प्रयोग न करके मन्थरा पर आश्रित होकर लोकनिंदा की पात्र बनीं | जो कि नहीं होना चाहिए था |* *आज के उठापटक के युग में ऐसे लोग बहुतायत संख्या में मिल जाते हैं जो किसी हंसते - खेलते परिवार के सदस्य को बरगला कर उसकी बुद्धि भ्रमित कर देते हैं , ऐसा करके उनको आत्मिक प्रसन्नता मिलती हो या न मिलती हो परमतु क्षणिक आनंदानुभूति अवश्य होती होगी | यदि पिता - पुत्र में या गुर - शिष्य में परस्पर प्रेम बना हुआ है और परिवार उन्नति कर रहा है तो कुछ लोग यह देख नहीं पाते है क्योंकि इस संसार में लोग अपने दुख से कम एवं दूसरों का सुख देखकर कुछ ज्यादा ही दुखी होने लगे हैं | ऐसे लोग अवसर ढूंढकर उस पुत्र या शिष्य के जीवन में प्रवेश करके कभी धन का लालच देकर तो कभी अन्य लोभ देकर उसे परिवार के विरुद्ध भड़काने लगता है और यहीं पर उस व्यक्ति का विवेक कुंद होने लगता है और वह ऐसे लोगों के चक्रव्यूह में फंसकर अपने उस पिता के विरुद्ध विद्रेह कर बैठता है जिसने उसे योग्य बनाया था | इसका परिणाम यह होता है कि इस कुचक्र में फंसकर अपनी दुनिया अलग बना लेता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह कह सकता हूँ कि उसके जीवन में एक समय ऐसा भी आता है कि उसे बरगलाने वाले सारे लोग उससे पीछा छुड़ा लेते हैं तब वह अपने किये पर पछताने लगता है | पश्चाताप एवं आत्मग्लानि की अग्नि उसे जलाने लगती है | यद्यपि वह अपने द्वारा की गयी गल्तियों को जानता तो है परंतु कभी अपनी झूठी शान में तो कभी साहस की कमी के कारण वह व्यक्त नहीं कर पाता है | ऐसे में यदि वह सम्बंधित व्यक्ति (पिता या गुरु) से अपने कृत्यों के लिए क्षमाप्रार्थी नहीं हो पाते है तो लोकनिंदा एवं आत्मग्लानि की धधकती हुई अग्नि उसे सदैव के लिए नकारात्मक बना देती है और उसका सम्पूर्ण जीवन निंदनीय बनकर रह जाता है |* *मनुष्य से भूल हो जाना स्वाभाविक है परंतु बार - बार इशारा करने पर भी अपनी भूल को न सुधारना जीवन की सबसे बड़ी भूल कही जा सकती है |*

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