हलछठ का व्रत एवं नारी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

03 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

हलछठ का व्रत एवं नारी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में त्यौहारों की कमी नहीं है | नित्य नये त्यौहार यहाँ सामाजिक एवं धार्मिक समसरता बिखेरते रहते हैं | ज्यादातर व्रत स्त्रियों के द्वारा ही किये जाते हैं | कभी भाई के लिए , कभी पति के लिए तो कभी पुत्रों के लिए | इसी क्रम में आज भाद्रपद कृष्णपक्ष की षष्ठी (छठ) को भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी के बड़े भाई शेषावतार का जन्मोत्सव अलग ढंग से मनाया जाता है | आज के पर्व में मातायें अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं | इसे हलछठ , ललही छठ , या तिन्नी छठ के नाम से जाना जाता है | बलराम को हल और मूसल से खास प्रेम था | यही उनके प्रमुख अस्त्र भी थे | इसलिए इस दिन किसान हल, मूसल और बैल की पूजा करते हैं. इसे किसानों के त्योहार के रूप में भी देखा जाता है | आज के दिन मातायें व्रत रहकर छठी माता से अपने पुत्रों के कुशलता की प्रार्थना करती हैं | महुए की दातौन करके व्रत का शुभारम्भ होता है | चूंकि बलराम जी का अस्त्र हल एवं मूसल था अत: आज के दिन मातायें हल से जोते हुए खेत के अनाज या फलों का सेवन नहीं करती है | महुआ एवं तिन्नी के चावल (एक विशेष चावल जो झीलों में स्वयं उगता है) का ही सेवन करती हैं | विशेष बात यह है कि सभी प्रकार के वैदिक / पौराणिक अनुष्ठानों में विशेष महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले गाय के दूध या दही का आज के त्याग किया जाता है | आज भैंस के ही दूध दही एवं घी का सेवन माताओं द्वारा किया जाता है |* *आज एक नवीन विषय पर चिंतन करने की आवश्यकता है कि दिस समाज को पुरुष प्रधान समाज कहा जाता है वह समाज क्या वास्तव में पुरुष प्रधान ह?? किसी भी समाज का निर्माण होता है परिवारों से , और परिवार के निर्माण में एक नारी की महत्तवपूर्ण भूमिका होती है | तो समाज अकेले पुरुष का ही क्यों ? वह नारी जो आजीवन किसी न किसी रूप में पुरुष के प्रति समर्पित ही रहती है उस नारी के प्रति पुरुष के मन में सम्मान का भाव क्यों क्षणिक ही होता है ? बचपन में भाई की कुशलता के लिए व्रत से इनकी यात्रा प्रारम्भ होती है | भाई के लिए बहुला चौथ का निर्जल व्रत ! विवाहोपरान्त पति के लिए करवा चौथ व हरितालिका तीज का निर्जल व्रत फिर पुत्रों के लिए व्रत | मेरे "आचार्य अर्जुन तिवारी" के कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि एक नारी जीवन भर अपने परिवार के सदस्यों के लिए अलग - अलग व्रत रहा करती है , परंतु क्या कभी किसी भाई ने अपनी बहन के लिए कोई व्रत रखा ? क्या किसी पति ने अपनी पत्नी के लिए उपवास किया या किसी पुत्र ने कभी अपनी माँ के लिए कोई व्रत किया ?? शायद नहीं ! नारी के इन व्रतों के बदले में पुरुषों के द्वारा सदैव इनको उपेक्षा ही मिली है | आखिर ऐसा क्यों होता जो हमारे लिए बिना जल पिये बिना अन्न खाये पूरा दिन व्यतीत कर देती है उसको यदि हम बदले में कुछ न दे पायें तो सम्मान तो दे ही सकते हैं | विचार कीजिएगा |* *जिस पुत्र ने अपनी माँ को घर से दुत्कार कर वृद्धाश्रम भेज दिया ऐसे भी कुपुत्र के लिए हलछठ का व्रत करने वाली देवियों को दण्डवत् प्रणाम |*

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