प्रसन्नता :----- आचार्य अर्जुन तिवारी

03 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (43 बार पढ़ा जा चुका है)

प्रसन्नता :----- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*इस धरती पर मनुष्य का प्रसन्न होना एक मानसिक दशा है | प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए धन - ऐश्वर्य का होना आवश्यक नहीं है | प्राय: देखा जाता है कि मध्यमवर्गीय लोग धनी लोगों से कहीं अधिक प्रसन्न रहते हैं , अपने परिवार व मित्रों के बीच उनके खुशी के ठहाके सुने जा सकते हैं | प्रसन्न रहने का रहस्य यही है कि मनुष्य के पास एक अच्छा संस्कारी परिवार हो , अच्छे मित्र हों तो वह सदैव प्रसन्न रहता है | मनुष्य के पास धन हो या न हो परंतु यदि उसके पास रिश्तों पूंजी है तो वह प्रसन्न रहा करता है | यह भी आवश्यक नहीं है कि सदैव प्रसन्न दिखने वाले मनुष्य के जीवन में विषमतायें नहीं होती हैं | क्योंकि प्रतिकूलता , सुख - दुख , संयोग - वियोग प्रकृति का नियम है | प्रतिकूल परिस्थितियां प्रत्येक मनुष्य के जीवन में होती हैं | एक सुखद जीवन जीने की इच्छा सबकी होती है परंतु इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि अच्छा भविष्य प्राप्त करने के लिए मनुष्य को जो वर्तमान में मिल रहा है उसे भी बरबाद कर दे | मनुष्य को वर्तमान में प्रसन्न रहते हुए उस क्षण का सदुपयोग करते हुए कर्म करते रहना चाहिए | क्योंकि दुखी रहकर एक सुंदर भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती है | पर्सन्न रहना मनुष्य की मनोदशा पर आधारित होता है | आपने आभास किया होगा कि कभी - कभी जो प्रसन्नता एवं संतुष्टि घर की सूखी एवं बेस्वाद रोटी खाने पर प्राप्त हो जाती है वह पाँच सितारा होटल के व्यंजनों में भी नहीं मिलती है | एक प्रसन्नचित्त मनुष्य अपने छत पर पक्षियों के लिए जल रखकर प्रसन्न हो जाता है वहीं दूसरी ओर दूसरा मनुष्य मंदिरों में एक अच्छी धनराशि देकर भी यह प्रसन्नता का अनुभव नहीं कर पाता है क्योंकि उसकी मनोदशा सकारात्मक नहीं होती है |* *आज प्रसन्नता का जैसे लोप होता जा रहा है मनुष्य बाहरी रूप से तो समृद्ध होता चला जा रहा है परंतु वह अंदर से खोखला भी हो रहा है | प्रसन्नता का संबंध मानसिक भावनाओं से होता है | मनुष्य की भावनायें ही भीतर से कचोटती रहती हैं और मनुष्य दुखी रहता है | मनुष्य के दुख का सबसे बड़ा कारण यह है कि आज मनुष्य अपनी कम और संसार की चिंता अधिक करने लगा है कि मैं यह करूँगा तो लोग क्या कहेंगे | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य को संसार की चिंता न करके वही सार्थक व सकारात्मक कार्य करने चाहिए जिसमें उसे स्वयं को प्रसन्नता प्राप्त हो और उसके कार्यों से अन्य लोग भी प्रसन्नता का अनुभव कर सकें | प्रसन्नता का द्योतक धन को मानने वालों को बताना चाहूँगा कि धनी व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं रह सकता क्योंकि उसके मन में सदैव अपने धन के रक्षण की चिंता बनी रहती है और वह उसी चिंता में अप्रसन्न भी रहा करता है | समाज से अलग रहकर प्रसन्नता का अनुभव नहीं किया जा सकता है | किसी की बात पर अपसन्न होने के पहले उस बात के दोनों पहलुओं पर ध्यानाकर्षण किया जाय तो प्रसन्नता अवश्य प्राप्त होगी | प्रसन्न रहने के लिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर क्रोध को न ठहरने दें , यदि किसी से कोई शिकायत भी हो तो उसे बात करके सुलझाने का प्रयास करते हुए अपनी बात को सकारात्मकता के साथ स्पष्ट रूप से प्रेषित करें एवं नकारात्मकता को ज्यादा देर तक अपने भीतर न ठहरने दें अन्यथा यह आपकी प्रसन्नता का हरण कर सकती है |* *मनुष्य द्वारा आत्मीयता का विस्तार ही प्रसन्नता को असीम बनाता है | प्रसन्नता बटोरने से नहीं अपितु बाँटने से बढती है |*

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