नारी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

03 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (42 बार पढ़ा जा चुका है)

नारी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*ईश्वर ने सृष्टि की सुंदर रचना की, जीवों को उत्पन्न किया | फिर नर-नारी का जोड़ा बनाकर सृष्टि को मैथुनी सृष्टि में परिवर्तित किया | सदैव से पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली नारी समय समय पर उपेक्षा का शिकार होती रही है | और इस समाज को पुरुषप्रधान समाज की संज्ञा दी जाती रही है | जबकि यह न तो सत्य है और न ही मानने योग्य ही है | यदि नारी अपने बच्चों में वह संस्कार न डाले जो उसे समाज में उच्च आदर्श स्थापित करने में सहायक सिद्ध होते हैं , तो पुरुष का अस्तित्व ही कहाँ बचता है | जन्म लेने के बाद सारा जीवन वह समर्पित होकर ही बिता देती है | शायद इसीलिए भारतीय वांग्मय में नारी उच्चश्रेणी में पूज्य मानते हुए लिख दिया गया है ------ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं | सनातनकाल से अनुसुईया, सती सावित्री, गार्गी, अपाला, महारानी लक्मीबाई, जीजाबाई आदि माताओं ने उच्च आदर्श स्थापित करके भारतीय मर्यादा को अक्षुण्ण बनाये रखा | आज के वर्तमान युग में भी अनेकानेक कीर्तिमान स्थापित करने वाली नारी को यह समाज बराबर का स्थान न देकर अवसर मिलते ही निंदा करने को तत्पर ही दिखाई पड़ता है | ऐसे समय में एक दोहा याद आता है------- नारी निंदा मत करो, नारी नर की खान | नारी ते नर होत हैं ध्रुव प्रहलाद समान || परंतु आज के परिवेश में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में भारतीय नारियां भी अपना वह आदर्श भूलती हुई दिखाई पड़ती हैं , जिसके लिए वह जानी जाती थीं |* *आज परिवार टूटने का चलन सा हो गया है , एकल परिवार समाप्त से हो गये हैं | इसका कारण कहीं न कहीं से नारी ही बन रही है | पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधकर चलाने की कला वह भूल सी गयी है |आज एक माँ जब अपने कलेजे के टुकड़े को विदा करती है तो वह यह सोंचती है कि मेरी बेटी ऐसे परिवार में जाय जहाँ ज्यादा काम न हो , यदि बड़ा परिवार मिल भी जाता है तो माँ यही सोंचती है कि किसी तरह मेरी बिटिया अलग हो जाय | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" सबकी बात तो नहीं कर रहा हूँ पर अधिकतर यही देखा जा रहा है | और जब बिटिया ससुराल में अपने सास- ससुर से अलग होती है तब वह माँ सुकून की सांस लेती है कि अब मेरी बिटिया को ज्यादा मेहनत नहीं पड़ेगी | मगर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब वही माँ अपने बेटे का विवाह करके बहू लाती है , और कुछ दिन बाद जब बहू बेटे को लेकर अलग होती है तो माँ को बड़ा कष्ट होता है | क्यों भाई ??? जब आपकी बिटिया अलग होती है तो सुकून मिलता है , परंतु जब बहू अलग होती है तो अपार कष्ट हो जाता है | वह नारी अपने आदर्शों को आज भूल चुकी है | वह नारी आज बेटी और बहू में अन्तर करना सीख गई है |* *नारी प्रगतिशील थी , है और रहेगी | परंतु इन दुष्प्रवृत्तियों का त्याग करके एक बार पुन: उच्च आदर्शों की स्थापना करके नारी समाज को एक उच्चपथ-प्रदर्शक की भूमिका में आना पड़ेगा |*

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