चलो ,अपने बुझे रिस्ते को दफनाते हैं !

03 सितम्बर 2018   |  आयेशा मेहता   (112 बार पढ़ा जा चुका है)

चलो ,अपने बुझे रिस्ते को दफनाते हैं ! - शब्द (shabd.in)

रास्ते अलग होने से पहले ,

चलो अपने बुझे रिस्ते को दफनाते हैं ा

तन-मन का क्या ?

उससे तो अलग हो ही जायेंगे ,

एक-दूसरे के आत्माओं से जो उलझे हैं ,

चलो,पहले उनको सुलझाते हैं ा

जरा रात की ख़ामोशी में ,

बीतें पन्नों को पलटना ,

मेरे साथ बिताये पल से ,

खूबसूरत लम्हों को चुन लेना ,

दिल तुम्हारा फिर से बैठ जाएगा,

बेबजह मेरी यादों से उलझ जाओगे ,

पर इस बार तुम टूटना नहीं ,

उन यादों की पोटली बना ,

अग्नि को समर्पित कर देना ा

मैं भी उसी दहकते आग में ,

सभी नज्मों को तोड़कर फेंक दूंगी ,

जो तुम्हारी याद में लिखी थी ,

और वे सभी जख्म भी उड़ेल दूंगी ,

जिसे देकर मुझे ,तुम खुद भी तो रोये थे ा

हमारे ही आँखों के सामने ,

हमारी आत्माएँ धू-धू कर जलेगी ,

आग की लपेटों से ,

पूरा कायनात पिघल जाएगा ,

और हमारा मोम-सा देह ,

प्राण-विहीन हो ,बेसुध पत्थर का हो जाएगा

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कामिनी सिन्हा
29 सितम्बर 2018

इतनी गहरी भावनाये,इतने मर्मस्पर्शी शब्द इतनी काम उम्र में .........वाकई ,आप बहुत आगे जाएगी ,स्नेह

आयेशा मेहता
01 अक्तूबर 2018

प्रिय कामिनी जी आपके प्यार और आशीर्वाद के लिए मैं आपका सदा आभारी रहूँगी ा

रेणु
11 सितम्बर 2018

बहुत मर्मस्पर्शी और सराहनीय रचना प्रिय आयेशा | लिखते रहिये | आप बेहतरीन लिख रही हैं | सस्नेह --

अलोक सिन्हा
04 सितम्बर 2018

बहुत अच्छी व् मार्मिक रचना है |

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