“कजरी का धीरज” (लघुकथा)

04 सितम्बर 2018   |  महातम मिश्रा   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

लीलाधारी प्रभु कृष्ण जन्माष्टमी के परम पावन पुनीत अवसर पर आप सभी महानुभावों को हार्दिक बधाई!


“कजरी का धीरज” (लघुकथा)


कजरी की शादी बड़ी धूम-धाम से हुई पर कुछ आपसी अनिच्छ्नीय विवादों में रिश्तों का तनाव इतना बढ़ा कि उसके ससुराल वालों ने आवागमन के सारे संबंध ही तोड़ लिए और कजरी अपनी ससुराल की चाहरदीवारों में सिमट कर रह गई। देखते- देखते दस वर्ष का लंबा समय निकल गया और कजरी अपने मायके का मुंह न देख पायी। उसके माँ-बाप और भाइयों ने कई बार होली-दिवाली और राखी के अवसर पर, बेटी के लिए अपने मान-सम्मान को भुलाकर उसके ससुराल के दरवाजे पर अनुनय की दस्तक तो दी पर हर बार बे-इज्जत होकर लौट जाने को मजबूर हो गए और कजरी अपने अरमानों को लिए कुढ़ती रही और एक फोन के लिए तरसती रही जो आज के समय में एक अदना आदमी के लिए भी अस्पृश्य नहीं है।


खैर, समय किसी का इंतजार नहीं करता, धीरे-धीर परिस्थिति सामान्य हुई और धीरज का फल मिलना ही था जिसे कोई भी रोक पाने में सक्षम नहीं होता है। तमाम बंदिशों के वावजूद कजरी के पाँव जब आजाद होकर अपने मायके के सिवान में बिना किसी औपचारिक पद-चाप के दाखिल हुए तो गाँव की प्रतीक्षारत आँखें खुशी से झूम उठी और मां की बे-बस आँखेँ, पिता का बैठा हुआ दिल और भाई की फड़कती कलाई के हक की राखी कुछ यूँ मुस्कुरा रही थी मानों सत्य की विजय हो गई । वर्षो का सूना आँगन गुलजार हो गया और कजरी के दो नन्हें बच्चे नाना-नानी की गोद में छलकने लगे मानो बंधिता अपने भाई की कलाई पकड़कर आजाद हो गई। दो दिन बाद ही उसे पुनः अपने ससुराल भी लौटना था पर उसने अपनी सासू माँ से कृष्ण जन्माष्टमी तक रुकने के लिए अपील किया और उसके पेरोल की मिंयाद मंजूर हो गई फिर क्या आज अपने लड्डू गोपाल को झूला झुलाए जा रही है और सखियों संग कजरी, कीर्तन इत्यादि के साथ अपने बचपन की गलियों से मिलकर सारे गम को भूल गयी है। गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो.......!


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "गज़ल" चलो जी कुछ ख़ता करते हैं इशारों में



महातम मिश्रा
17 सितम्बर 2018

बिलकुल सही कहा आप ने बहन, यही पीड़ा कहीं देखा और महसूस कर लिख दिया, शुभाशीर्बाद

रेणु
16 सितम्बर 2018

बहुत ही मर्मस्पर्शी आदरणीय भैया | कजरी के दिन बहुरे ये बात संतोषजनक लगी पर इतने लम्बे समय तक उसका मायके से दूर रहना -- बहुत ही वेदना पूर्ण है | लडकी के लिए मायका तीर्थ जैसा होता है उसे उससे दूर रखना बहुत बड़ा अपराध है | सुंदर हृदयस्पर्शी लघुकथा के लिए आह्बर और बधाई |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
24 अगस्त 2018
“मुक्तक”मापनी- २१२२ २१२२ २२१२ २१२जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा। बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा। द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं- खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-१ मापनी- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२जाना कहाँ रहना कहाँ कोई किता चलता नहीं। यह बाढ़ कैसी आ गई
24 अगस्त 2018
21 अगस्त 2018
मापनी -२१२२ २१२२ २१२२ २१२ सामंत- आ पदांत-दिख रहा“गीतिका”अटल बिन यह देश अपना आज कैसा दिख रहाहर नजर नम हो रही पल बे-खबर सा दिख रहाशब्द जिनके अब कभी सुर गीत गाएंगे नहींखो दिया हमने समय को अब इंसा दिख रहा।।याद आती हैं वे बातें जो सदन में छप गईझुक गए संख्या की खातिर नभ सितारा
21 अगस्त 2018
30 अगस्त 2018
“कुंडलिया” मोहित कर लेता कमल, जल के ऊपर फूल। भीतर डूबी नाल है, हरा पान अनुकूल॥ हरा पान अनुकूल, मूल कीचड़ सुख लेता। खिल जाता दु:ख भूल, तूल कब रंग चहेता॥ कह गौतम कविराय, दंभ मत करना रोहित। हँसता खिलकर खूब, कमल करता मन मोहित॥महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
30 अगस्त 2018
04 सितम्बर 2018
"
वज़्न- 1222 12222122 2, काफ़िया-आ, रदीफ़ - " करते हैं इशारोमें""गज़ल"चलो जी कुछ ख़ताकरते हैं इशारों मेंबवंडर ही खड़ा करतेहै इशारों मेंकहाँ तक चल सकेंगेदिनमान चुप होकरजलाते है अगन दीयाहै इशारों में।।नयी जब रोशनी होगीतम फ़ना होगाउड़ाते हैं वोफतिंगा हैं इशारों में।।भरा पानी शहर मेंले आग मत जानाबुझे मन का ठिकान
04 सितम्बर 2018
12 सितम्बर 2018
<!--[if gte mso 9]><xml> <o:OfficeDocumentSettings> <o:RelyOnVML/> <o:AllowPNG/> </o:OfficeDocumentSettings></xml><![endif]--><!--[if gte mso 9]><xml> <w:WordDocument> <w:View>Normal</w:View> <w:Zoom>0</w:Zoom> <w:TrackMoves/> <w:TrackFormatting/> <w:PunctuationKerning/> <w:ValidateAgainstSc
12 सितम्बर 2018
29 अगस्त 2018
“हाइकु” सजी बाजर राखी रक्षा त्यौहार रंग बिरंगी॥-1 रंग अनेक कच्चे पतले धागेराखी वन्धन॥-2 पावनी राखी रिश्ता ऋतु बैसाखी सुंदर पल॥-3 ओस छाई रीवर्षा ऋतु आई रीझूलती नारी॥-4 विहग उड़ेपग सिहर पड़ेडरती नारी॥ -5 आ रे बसंततूँ ही दिग-दिगंतसुंदर नारी॥-6 महतम मिश्र, गौतम गोरखपुरी
29 अगस्त 2018
21 अगस्त 2018
काफ़िया- आ स्वर रदीफ़- रह गया वज्न- २१२ २१२ २१२ २१२ फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन"गज़ल"आदमी भल फरज मापता रह गयाले उधारी करज छाँकता रहा गयाखोद गड्ढा बनी भीत उसकी कभीजिंदगी भर उसे पाटता रह गया।।दूर होते गए आ सवालों में सभीहल पजल क्या हुई सोचता रह गया।।उमर भर की जहमद मिली मुफ्त
21 अगस्त 2018
04 सितम्बर 2018
“भोजपुरी गीत”कइसे जईबू गोरीछलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइलकहीं बैठल होइहेंछुपि के साँवरिया, नजरिया में चोर हो गइल...... बरसी गजरा तुहार, भीगी अँचरा लिलार मति कर मन शृंगार, रार कजरा के धारपायल खनकी तेहोइहें गुलजार गोरिया मनन कर घर बार, जनि कर तूँ विहार,कइसे विसरी धनापलखत पहरिया, शहरिया अंजोर हो गइ
04 सितम्बर 2018
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x