भगवान की पूर्णता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

04 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (86 बार पढ़ा जा चुका है)

भगवान की पूर्णता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

!! भगवत्कृपा हि के वलम् !! *भगवान श्री कृष्ण का चरित्र इतना अलौकिक है कि इसको जितना ही जानने का प्रयास किया जाय उतने ही रहस्य गहराते जाते हैं , इन रहस्यों को जानने के लिए अब तक कई महापुरुषों ने प्रयास तक किया परंतु थोड़ा सा समझ लेने के बाद वे भी आगे समझ पाने की स्थिति में ही नहीं रह गये क्योंकि जितना समझ पाये उतने में ही उनको इतना आनंद मिल गया कि आगे कुछ और समझने की आवश्यकता ही नहीं समझी | जहाँ भगवान के अन्यान्य अवतार किसी न किसी प्रकार की मर्यादा में बंधे रहे वहीं भगवान कृष्ण पूर्णब्रह्म के रूप में अवतरित हुए जो कि सतयुग एवं त्रेता की मर्यादाओं के कारण जो कार्य नहीं कर सके थे वह द्वापर में पूर्ण किया | भगवान श्री कृष्ण की प्रेयसी गोपियों में पूर्वजन्म के अनेक ऋषि - महर्षि तो थे ही साथ ही रामावतार भगवान श्री राम के रूप लावण्य को देखकर मोहित हुई अवधपुर , जनकपुर एवं वनपथ की अनेक नारियाँ भी थीं | कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व के सभी अवतारों में उनके प्रति जिसका जो भाव रहा उसको यथोचित फल प्रदान करने के लिए कृष्णावतार हुआ | चाहे वे भक्त रहे हों या अभक्त यदि किसी की भी कोई कामना अधूरी रह गयी तो उसे पूरा किया भगवान श्री कृष्ण ने | इसीलिए वे पूर्णावतार कहे गये हैं | जब भगवान वामनावतार में राजा बलि के यहाँ गये तो बलि की कन्या (कहीं कहीं इसे बलि की बहन भी बताया गया है) इनके बालस्वरूप को देखकर मोहित हो गयी और उसके मन मों भाव आया कि यदि इतना मनोहर बालक मेरा होता तो मैं इसको अपना स्तनपान कराती , भगवान उसके भावों को समझकर मन ही मन स्वीकार कर लेते हैं , परंतु जब राजा बलि का सबकुछ चला गया तो रत्नमाला का भाव बदल गया और वह मन में विचार करती है कि :- ऐसे दुष्ट बालक को तो मैं अपने स्तन में विष लगाकर पिला देती और यह मृत हो जाता | भगवान को यह भी स्वीकार हो गया | वही रत्नमाला "पूतना" बनकर आई और भगवान ने उसकी पूर्व की कामना को पूर्ण किया |* *आज प्राय: विद्वानों के बीच चर्चा होती रहती है एवं लोगों के मन में एक प्रश्न उठा करता है कि "रामावतार" हो या "कृष्णावतार" भगवान ने सर्वप्रथम नारी का ही वध क्यों किया | जहाँ रामावतार में सर्वप्रथम भगवान श्री राम ने "ताड़का" का वध किया वहीं कृष्णावतार में उनसे मिलने "पूतना" आ गयी और बालकृष्ण के द्वारा उसको मातृत्व सुख प्रदान करके प्राण ले लिए गये | आखिर सबसे पहले नारी ही क्यों ?? किसी पुरुष का वध क्यों नहीं ??? यह विषय बहुत ही रहस्यात्मक है इस विषय पर मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का विचार है कि :- नारी सृष्टि की धुरी है | बिना नारी के सृष्टि की संकल्पना भी नहीं की जा सकती , और जब नारी कुमार्गगामी हो जाय तो उसका वध (त्याग) कर देना ही उचित है | यद्यपि नारी से ही नर है तो यदि नारीस्वभाव विकृत होगा तो पूरी संस्कृति ही विकृत हो जायेगी | आज नारी स्वतंत्रता की बात हर ओर कही जाती है | यह होना भी चाहिए परंतु यहाँ प्रत्येक जड़ - चेतन की मर्यादायें स्थापित हैं | जब भी इन मर्यादाओं का उल्लंघन होता है तभी स्थिति भयावह बनती है | भगवान ने सर्वप्रथम ताड़का एवं पूतना का वध करते यह संदेश देने का प्रयास किया है नारी ममता की मूरत है उसे यह ममत्व कभी भी नहीं त्यागना चाहिए | माँ जब मातृभाव का त्याग कर देती है तो वह जड़रूप हो जाती है | क्योंकि यही वह भाव है जो एक नारी को पूर्णत्व प्रदान करती है | शायद इसीलिए कहा भी गया है कि "कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति" | द्वापर के कृष्णावतार का उद्देश्य "धर्मस्थापना" के साथ - साथ पूर्व के दिये वरदानों या किसी के मन में उठी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए भी हुआ , इसीलिए ब्रह्म को पूर्णरूप में आना पड़ा |* *पूर्ण तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार किये गये कर्म का फल अवश्य मिलता है उसी प्रतार भगवान के प्रति की गई इच्छा भी अवश्य पूर्ण होती है |*

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