देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटाते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है

06 सितम्बर 2018   |  प्रियंका   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटाते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को हटाते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है, नए कानून के अनुसार अगर दो वयस्क (एडल्ट) लोग आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह अपराध की श्रेणी में नही आयगा।


सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, एएम खानविलकर, डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने इस मुद्दें पर सुनवाई की ।


धारा 377

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले को बदलते हुए इसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया था ।


धारा 377 को पहली बार कोर्ट में 1994 में चुनौती दी गई थी, 24 साल और बहुतेरे अपीलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला दिया है ।


कोर्ट ने क्या क्या कहा ?


1) चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा जो जैसे है उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए ।


2) व्यक्तित्व को बदला नही जा सकता। यह खुद को परिभाषित करता है ।


3) समलैंगिक लोगो को सम्मान से जीने का अधिकार है, संवैधानिक पीठ ने माना कि समलैंगिकता अपराध नही है, और इसे लेकर लोगो को अपनी सोच बदलनी चाहिये ।


4) आत्म अभिव्यक्ति से इनकार करना मौत को आमंत्रित करना है


किस जज ने क्या कहा ?


जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि आज का फैसला इस समुदाय को उनके हक देने के लिए एक छोटा सा कदम है । इस समुदाय के निजी जीवन मे झाँकने का अधिकार किसी को नही ।


जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा कि इस समुदाय के साथ पहले जो भेदभाव हुये है उसके लिए किसी को माफ नही किया जयेगा।


जस्टिस नरीमन ने कहा ये कोई मानसिक बीमारी नही है, केंद्र सरकारी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ठीक से समझाये ताकि इस समुदाय को कलंकित न समझा जाये


याचिकाकर्ता ने दिसंबर, 2004 में हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

-सुप्रीम कोर्ट ने 3 अप्रैल, 2006 हाई कोर्ट से इस मामले को दोबारा सुनने को कहा।

-केंद्र सरकार ने 18 सितंबर, 2008 को हाई कोर्ट से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा।

-मामले में हाई कोर्ट ने 7 नवंबर, 2008 को फैसला सुरक्षित किया।

-दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 को आईपीसी की धारा 377 को रद्द करते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया।

-हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में फिर से चुनौती दी गई।

-इस मामले में 15 फरवरी, 2012 से रोजाना सुनवाई।

-रोजाना सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2012 में फैसला सुरक्षित किया।

-सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर, 2013 को हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध करार दिया।

-सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में रिव्यू पिटिशन खारिज कर दिया।

-एस जौहर, पत्रकार सुनील मेहरा, सेफ रितु डालमिया, होटल बिजनेसमैन अमन नाथ और आयशा कपूर ने 2016 में धारा 377 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

-अगस्त, 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'निजता के अधिकार' पर दिए गए फैसले में सेक्स-संबंधी झुकावों को मौलिक अधिकार माना और कहा कि किसी भी व्यक्ति का सेक्स संबंधी झुकाव उसके राइट टू प्राइवेसी का मूलभूत अंग है।

-6 सितंबर 2018- समलैंगिक संबंध अपराध नहीं

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