न भूलें मूल को :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

07 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (54 बार पढ़ा जा चुका है)

  न भूलें मूल को :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भगवान श्री कृष्ण की प्रत्येक लीला में एक रहस्य तो छुपा ही है साथ ही आम जनमानस के लिए एक संदेश भी उनकी लीला के माध्यम से मिलता है | जैसा कि ग्रंथों के माध्यम से यह बताया जाता है कि पूर्व जन्मोक्त कर्मों के आधार पर गोप ग्वाल या राक्षस बने प्राणियों का उद्धार भगवान ने "कृष्णावतार" में किया था ! इसी क्रम में एक कथा आती है तृणावर्त की जो पूर्नजन्म में सहस्राक्ष नाम का राजा था और अपनी रानियों के साथ नर्मदा नदी में विहार कर रहा था | उसने उधर से जा रहे दुर्वासा जी को प्रणाम नहीं किया तो दुर्वासा जी ने उसे राक्षस होने का श्राप दे दिया | वही सहस्राक्ष तृणावर्त के रूप में जन्मा | कंस के द्वारा भेजी गयी पूतना मारी गयी तब कंस ने भगवान कृष्ण का वध करने के लिए तृणावर्त को भेजा | वह बवंडर का रूप बनाकर बालकृष्ण को ले उड़ा | बालकृष्ण ने उसका गला पकड़ लिया और गला दबने से उसकी मृत्यु हो गयी , और वह पृथ्वी पर आ गिरा | तृणावर्त का वध करके भगवान ने यह संदेश दिया है कि मनुष्य को अपनी जमीन छोड़कर हवा में उड़ने का प्रयास नहीं करना चाहिए | अर्थात विकास चाहे जितना हो जाय परंतु अपनी मूल संस्कृति का विस्मरण नहीं करना चाहिए , क्योंकि अन्त में अपनी संस्कृति ही के माध्यम से सद्गती प्राप्त होनी है |* *आज का मनुष्य हवा में उड़ रहा है | अपनी मूल संस्कृति को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति के पीछे जिस तरह आज हम दौड़ रहे हैं वह आने वाले समय की बात छोड़ो अभी से ही घातक दिखते लगी है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" कहना चाहता हूँ कि जिस प्रकार पंछी चाहे जितना दिन - रात आसमान की ऊंचाईयों पर उड़ता रहे परंतु यदि भोजन लेना है तो उसे पृथ्वी पर आना ही पड़ेगा , उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी संस्कृति से चाहे जितना दूर चला जाये परंतु अंतत: उसे वापस चाहे जैसे परंतु वापस आना ही पड़ेगा | आज जिस प्रकार मनुष्य बात बात पर अंग्रेजी भाषा का प्रदर्शन करता है उस पर कभी कभी हंसी आती है कि चाहे जितना अंग्रेज बन जाओ परंतु आपसे सम्बंधित कर्मकाण्ड हिन्दी एवं संस्कृत में ही होने हैं | आज के युवा पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर अपने माँ - बाप का त्याग करके या तो उनको घर से निकालकर वृद्धाश्रम भेज देते हैं या फिर उनसे अलग ही अपनी दुनिया बसा लेते है | ऐसे व्यक्ति अपने जन्मदाता को तो त्याग देते हैं परंतु आजीवन प्रत्येक स्थान पर उनकी पहचान उनके पिता के नाम से ही होती है जिसे वह जीवन भर नहीं हटा सकता ! तो त्याग किस बात का किया गया |* *इतिहास गवाह है कि जिसने भी जमीन छोड़कर उड़ने का प्रयास किया है उसे पुन: पृथ्वी पर आना ही पड़ा है | अत: अपने मूल का त्याग न किया जाय |*

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