समझें भावनाओं को :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

07 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (68 बार पढ़ा जा चुका है)

समझें भावनाओं को :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संसार में मनुष्य अनेकानेक रिश्ते बनाता है | कुछ रिश्ते तो मनुष्य को जन्म से ही मिलते हैं परंतु अनेक रिश्ते वह समाज में रहकर अपने व्यवहार से बनाता है | इन रिश्तों के बनने का मुख्य कारण होती हैं मनुष्य भावनायें | यदि हृदय में भावना न हो तो मनुष्य किसी रिश्ते को न तो बना पाता है और यदि बन भी गये तो भावनाशून्य रिश्ते अधिक दिन नहीं चलते हैं | जैसी जिसकी प्रवृत्ति होती है वैसे ही मित्र आदि उससे जुड़ते चले जाते हैं | भगवान श्रीकृष्ण एवं गोपियों का रिश्ता हो या फिर सुदामा का यह सभी भावना प्रधान थे | ठीक इसी प्रकार भगवान श्री राम की केवट , गीधराज जटायु , शवरी , सुग्रीव , हनुमान या विभीषण से कोई जन्म का रिश्ता नहीं था बल्कि ये रिश्ते हृदय की भावनाओं से बने थे और भावनायें इतनी प्रबल थीं कि युगों बीत जाने के बाद आज भी उनका गुणगान किया जाता है | इनमें प्रधान था हृदय का भाव क्योंकि भावना में भाव ही प्रधान होता है | यदि भगवान श्री राम हनुमान जी को पुत्रवत् प्रेम करते थे तो हनुमान जी भी श्री राम को अपना सबकुछ मानते थे | यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कभी भी भावनाओं को आहत करने का कार्य न किया जाय तो ये रिश्ते दूरगामी बने रहते हैं |* *आज युगपरिवर्तन के समय में मनुष्य के जीवन रिश्तों की बाढ सी आ गयी है | मार्ग चलते मनुष्य थोड़ी ही देर में एक दूसरे से प्रभावित होकर रिश्ते बना लेता है | यह रिश्ते बनने भी चाहिए परंतु कष्ट तब होता है जब मनुष्य एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान नहीं रख पाता , और यह रिश्ते कष्टकारी हो जाते हैं | आज मनुष्य बिना विचार किये ही किसी से भी कुछ भी कह देता है परंतु समय आने पर जब उसे पूरा नहीं कर पाता है तो स्वयं को तो होता ही है उससे ज्यादा आत्मिक कष्ट उस व्यक्ति को होता जिससे आपने कुछ कहा है | उसकी भावनायें आहत हो जाती हैं | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य को पहले किसी भी विषय पर अपने हृदय में विधिवत विचार करके ही किसी से कुछ भाव व्यक्त करना चाहिए , इससे यह होगा कि न तो आपकी और न ही किसी और की भावनायें आहत नहीं होंगी और सम्बन्ध बरकरार रहेंगे | परंतु आज हम भावनाओं में बहकर अपने भाव व्यक्त तो कर देते हैं परंतु उस पर स्थिर नहीं रह पाते | कारण है इच्छाशक्ति का मजबूत न होना | मनुष्य को अपने रिश्तों को बनाये रखने के लिए अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करना होता है | संसार में अन्य रिश्तों की अपेक्षा पति - पत्नी का रिश्ता मात्र भावनाओं एवं विश्वास पर ही टिका होता है | वैवाहिक जीवन में विषमतायें वहीं पैदा होती हैं जहाँ एक दूसरे की भावनायें आहत होती हैं | मनुष्य को चाहिए कि वह सतत् यह प्रयास करता रहे कि स्वयं के कारण कभी किसी की भावनायें आहत न हों |* *एक दूसरे को देखे बिना जो रिश्ते संसार में बन गये हैं उन्हें बनाये रखने का दायित्व हम सभी का है | रिश्ते बनते बहुत कठिनता से हैं परंतु थोड़ी सी बात पर टूट भी जाते हैं | अत: इन्हें बनाये रखने का प्रयास करते रहें |*

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